यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के तमाम एक्जिट पोल में भाजपा-सपा के वोट शेयर में वृद्धि और बसपा-कांग्रेस के वोट शेयर में कमी होने का अनुमान लगाया जा रहा है। सामान्य तौर पर लोग समझते हैं कि वोट शेयर बढ़ने से ज्यादा सीटें आती हैं और इससे किसी पार्टी की जीत पक्की हो जाती है। लेकिन तमाम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि वोट शेयर और जीती गई सीटों में हमेशा एक जैसा तालमेल नहीं होता।
बिहार विधानसभा चुनाव में भी सीटों और वोट शेयर के बीच यह ‘मिस-मैच’ देखा जा सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में आरजेडी ने 18.4 फीसदी वोट शेयर के साथ 80 सीटें जीतीं, जबकि इसी चुनाव में भाजपा ने 24.40 फीसदी वोट शेयर हासिल करने के बाद भी केवल 53 सीटों पर जीत हासिल की। यानी लगभग छह प्रतिशत ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बाद भी भाजपा को 27 कम सीटों पर जीत हासिल हुई।
इसके अगले चुनाव यानी 2020 में आरजेडी ने 4.79 फीसदी ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बाद भी पिछले चुनाव से पांच सीटें कम (80 से कम होकर 75 सीटें) हासिल कीं, जबकि भाजपा का वोट शेयर 4.96 फीसदी कम होने के बाद भी उनकी 21 सीटें बढ़ गईं। इस प्रकार वोट शेयर और सीटों की संख्या में आंख मिचौली इस चुनाव में भी जारी रही।
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में भाजपा ने 33 फीसदी वोट शेयर के साथ 32 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन इसके बाद अगले ही विधानसभा चुनाव में लगभग उतने ही वोट शेयर (32.3 फीसदी) के बाद भी भाजपा को केवल तीन सीटें मिलीं। इस चुनाव में कांग्रेस के वोट खिसककर आम आदमी पार्टी की ओर चले जाने के कारण यह स्थिति बनी। आम आदमी पार्टी को 2013 में 29.5 फीसदी वोट शेयर के साथ 28 सीटें मिली थीं, जबकि 2015 में 54.3 फीसदी वोटों के साथ 67 सीटें हासिल हुईं। इसी प्रकार वोटों और सीटों में मिस-मैच अन्य राज्यों में भी देखा जा सकता है।