जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस देवाशीष बरुआ की पीठ ने स्वत: संज्ञान वाले मामले में 9 मार्च को सुनाए आदेश में कहा, गोस्वामी पर अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 14 के तहत आपराधिक अवमानना का आरोप है। उन्होंने 17 जनवरी को अपने बचाव में हलफनामा दाखिल किया था।
गौहाटी हाईकोर्ट में वकील उत्पल गोस्वामी ने महिला जज के आभूषणों पर टिप्प्णी करने व उनकी तुलना भस्मासुर से करने के मामले में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने गोस्वामी को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया है और 10 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी।
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अदालत सजा पर 20 मार्च को सुनवाई करेगी। जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस देवाशीष बरुआ की पीठ ने स्वत: संज्ञान वाले मामले में 9 मार्च को सुनाए आदेश में कहा, गोस्वामी पर अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 14 के तहत आपराधिक अवमानना का आरोप है। उन्होंने 17 जनवरी को अपने बचाव में हलफनामा दाखिल किया था। हलफनामे के पैरा 5 और 6 में उन्होंने दोष स्वीकार किया है। पीठ ने कहा, गोस्वामी ने विशेष रूप से यह माना है कि उन्हें महसूस हुआ कि किसी भी अदालत के जज और मजिस्ट्रेट के सम्मान को संरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया है कि कानून का पर्याप्त ज्ञान नहीं होने के कारण उनसे अपराध हुआ है और वह इसके लिए बिना किसी शर्त के माफी मांगते हैं। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि यह उनका पहला अपराध है और भविष्य में ऐसा नहीं करेंगे।
यह कहा था गोस्वामी ने
गोस्वामी ने महिला जज पर कोर्ट रूम में मॉडल की तरह आभूषण पहनकर आने और बिना दूसरे पक्षों को सुने अपना फरमान सुनाने का आरोप लगाया था। गोस्वामी ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीष के समक्ष लंबित याचिका में कहा था कि महिला जज हर मौके पर वकीलों को उनकी बात भी नहीं रखने देती हैं। कानून और पुराने मामलों का उदाहरण देकर अपना आदेश थोपती हैं। वह एक गैंग की तरह कोर्ट रूम को नियंत्रित करने की कोशिश करती हैं। गोस्वामी ने यह भी आरोप लगाया था कि वह अपने टाइपिस्ट को कुछ खास मानती है। वह अपने कार्यालय सहायक की मदद से माजुली जिले से खाने-पीने का सामान इकट्ठा करती है और निजी काम के लिए एक आधिकारिक ड्राइवर और कार का भी उपयोग करती है। वकील ने उसकी तुलना एक पौराणिक राक्षस भस्मासुर से की थी।