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नई जिम्मेदारी : हिमंत के वीटो, शाह के नरम रुख ने बदली असम की सत्ता

Sun, 09 May 2021 04:04 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली 

सार

अब मुख्यमंत्री नहीं बने तो कभी नहीं, की जिद के कारण हिमंत को कुर्सी मिली है। केन्द्रीय मंत्री अमित शाह और नरेंद्र सिंह तोमर ने उनका साथ दिया। केन्द्रीय नेताओं के किसी दूसरे प्रस्ताव से सहमत नहीं होने पर हुआ रास्ता साफ
 
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हिमंता बिस्व सरमा - फोटो : social media
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विस्तार
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असम में सर्बानंद सोनोवाल का दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो सका। हिमंत बिस्व सरमा के वीटो के आगे उनकी एक न चली। राज्य में राजनीति और विधायकों पर कड़ी पकड़ रखने वाले हिमंत ने गुवाहाटी से दिल्ली की उड़ान भरने से पहले ठान लिया था कि इस बार वह मौका हाथ से नहीं जाने देंगे। बताते हैं हिमंत का मूड देखकर भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भी उन्हें ज्यादा छेड़ना जरूरी नहीं समझा। 

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सूत्रों के अनुसार सोनोवाल अब केंद्र में जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। रविवार को गुवाहाटी में हुई विधायक दल की बैठक में हिमंत बिस्व सरमा को नेता चुन लिया गया। अब राज्य के अगले मुख्यमंत्री वहीं होंगे। 

हिमंत सरमा को मनाने के कई प्रस्ताव आए थे
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली में तीन दौर की बैठकों में कई प्रस्ताव आए थे। इसमें पहला प्रस्ताव यह था कि सर्बानंद सोनोवाल राज्य के मुख्यमंत्री बनें और हिमंत बिस्व सरमा उपमुख्यमंत्री बनने के साथ कई बड़े विभाग अपने पास रखें। उनके कुछ करीबी विधायकों को महत्वपूर्ण ओहदा दिया जाए। 
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दूसरा प्रस्ताव यह था कि हिमंत केन्द्र सरकार में केन्द्रीय मंत्री बनें और उनके करीबी लोग राज्य सरकार में अहम जिम्मेदारी निभाएं। तीसरा प्रस्ताव यह भी था कि भाजपा राज्य में किसी और को विधायक दल का नेता चुने और सर्बानंद सोनोवाल, हिमंत दोनों केंद्रीय राजनीति में आएं और उन्हें मोदी सरकार में मंत्री बनाया जाए।

सूत्रों का कहना है कि दो-तीन दौर की बैठकों में हिमंत बिस्व सरमा ने इसके लिए हामी नहीं भरी। देर रात गुवाहाटी के एक सूत्र ने बताया कि हिमंत ने केन्द्रीय नेताओं को उनका वादा याद दिलाया। चुनाव के दौरान मिले भरोसे को दोहराया। 

अंत में चौथे दौर की बैठक में साफ हुआ कि सर्बानंद सोनोवाल और हिमंता बिस्व सरमा गुवाहाटी लौटें। रविवार को विधायक दल का नेता चुना जाएगा। केन्द्रीय मंत्री, असम के प्रभारी नरेन्द्र सिंह तोमर, भाजपा महासचिव अरुण सिंह केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर जाएंगे। 

यह निर्णय भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा महासचिव (संगठन मंत्री) बीएल संतोष समेत अन्य की सहमति से लिया। रविवार को यही हुआ। सर्बानंद सोनेवाल भी पहुंचे और हिमंता को उनकी महत्वाकांक्षा के अनुरूप राज्य का नेता चुन लिया गया।

संघ और भाजपा के नेता सोनोवाल को चाहते थे

सर्बानंद सोनोवाल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा और संघ के नेताओं का विश्वास हासिल है। सर्बानंद सोनोवाल असम गण परिषद से 2011 में भाजपा में आए थे। 2012 में वह असम भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। 2014 में भी उनके पास ही पार्टी की कमान थी। 2014 के आम चुनाव में सोनोवाल अपनी कुशलता के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गुड बुक में आए थे और चुनाव बाद केन्द्र सरकार में मंत्री बने थे। 2016 में उन्हें असम के भावी मुख्यमंत्री का चेहरा प्रधानमंत्री की सहमति पर घोषित किया था और वही राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। इस बार भी भाजपा और संघ के नेता सोनोवाल को ही चाहते थे।

हिमंत ने चुनाव के दौरान ही संकेतों में रख दी थी अपनी बात
असम विधानसभा चुनाव प्रचार 2021 के समय ही हिमंत ने समय पर अपना दांव चल दिया था। हिमंत को पता था कि सोनोवाल को अगले मुख्यमंत्री के तौर पर फिर प्रोजेक्ट किया जा सकता है। हिमंत चुनाव प्रचार के दौरान सर्बानंद की सक्रियता को भी भांप चुके थे। असम के दिवंगत मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के साथ राजनीति की बारीकियां सीख चुके हिमंत ने इस बार संदेश देने में कोई देरी नहीं की। वह कुछ दिन खामोशी ओढ़कर भी अपना मंतव्य जता चुके थे। 

लिहाजा भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने गुटबाजी को थामने के लिए प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से परहेज किया। इतना ही नहीं हिमंत को महत्व और भरोसा दोनों दिया। वैसे भी असम में पांच साल भले ही मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल थे, लेकिन कहा जाता रहा था कि सरकार हिमंत सरमा चलाते थे। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व हिमंत की पकड़ को भी समझ रहा था। भाजपा और उसके सहयोगियों के 76 विधायकों में से कोई 30 विधायक हिमंत के ही पाले में बताए जाते हैं। एजीपी और यूपीपीएल के विधायकों में हिमंत की ही लोकप्रियता है। इस तरह से विधायकों का मत जानने के मामले में हिमंत को सर्बानंद से आगे निकलने का पूरा भरोसा था।
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महत्वाकांक्षा में ही छोड़ा था कांग्रेस का साथ

हिमंत बिस्वा सरमा एक मिलनसार, राजनीति को समझने, दूसरों के साथ खड़े रहने वाले नेता हैं। न केवल राजनीति की बारीकियां जानते हैं, बल्कि क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं। महत्वाकांक्षी भी हैं। वह 2016 में चुनाव से पहले कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक कई बार अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश की। 2001-2015 तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी से विधायक रहकर पार्टी के भीतर और जनता में अच्छी छवि बना ली थी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व इसे नहीं भांप सका। निराशा मिलने पर हिमंत ने 23 अगस्त 2015 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा का पटका ओढ़ लिया। मई में भाजपा ने उन्हें सर्बानंद सोनोवाल के मंत्रिमंडल में दूसरे सबसे पॉवरफुल सदस्य के तौर पर जगह दी थी। माना जा रहा है कि यदि भाजपा हिमंत को अवसर नहीं देती तो वह अपने भावी राजनीतिक करियर को ध्यान में रखकर कोई भी निर्णय ले सकते थे।
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