सर्बानंद सोनोवाल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा और संघ के नेताओं का विश्वास हासिल है। सर्बानंद सोनोवाल असम गण परिषद से 2011 में भाजपा में आए थे। 2012 में वह असम भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। 2014 में भी उनके पास ही पार्टी की कमान थी। 2014 के आम चुनाव में सोनोवाल अपनी कुशलता के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गुड बुक में आए थे और चुनाव बाद केन्द्र सरकार में मंत्री बने थे। 2016 में उन्हें असम के भावी मुख्यमंत्री का चेहरा प्रधानमंत्री की सहमति पर घोषित किया था और वही राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। इस बार भी भाजपा और संघ के नेता सोनोवाल को ही चाहते थे।
हिमंत ने चुनाव के दौरान ही संकेतों में रख दी थी अपनी बात
असम विधानसभा चुनाव प्रचार 2021 के समय ही हिमंत ने समय पर अपना दांव चल दिया था। हिमंत को पता था कि सोनोवाल को अगले मुख्यमंत्री के तौर पर फिर प्रोजेक्ट किया जा सकता है। हिमंत चुनाव प्रचार के दौरान सर्बानंद की सक्रियता को भी भांप चुके थे। असम के दिवंगत मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के साथ राजनीति की बारीकियां सीख चुके हिमंत ने इस बार संदेश देने में कोई देरी नहीं की। वह कुछ दिन खामोशी ओढ़कर भी अपना मंतव्य जता चुके थे।
लिहाजा भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने गुटबाजी को थामने के लिए प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से परहेज किया। इतना ही नहीं हिमंत को महत्व और भरोसा दोनों दिया। वैसे भी असम में पांच साल भले ही मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल थे, लेकिन कहा जाता रहा था कि सरकार हिमंत सरमा चलाते थे। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व हिमंत की पकड़ को भी समझ रहा था। भाजपा और उसके सहयोगियों के 76 विधायकों में से कोई 30 विधायक हिमंत के ही पाले में बताए जाते हैं। एजीपी और यूपीपीएल के विधायकों में हिमंत की ही लोकप्रियता है। इस तरह से विधायकों का मत जानने के मामले में हिमंत को सर्बानंद से आगे निकलने का पूरा भरोसा था।
हिमंत बिस्वा सरमा एक मिलनसार, राजनीति को समझने, दूसरों के साथ खड़े रहने वाले नेता हैं। न केवल राजनीति की बारीकियां जानते हैं, बल्कि क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखते हैं। महत्वाकांक्षी भी हैं। वह 2016 में चुनाव से पहले कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक कई बार अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश की। 2001-2015 तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी से विधायक रहकर पार्टी के भीतर और जनता में अच्छी छवि बना ली थी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व इसे नहीं भांप सका। निराशा मिलने पर हिमंत ने 23 अगस्त 2015 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा का पटका ओढ़ लिया। मई में भाजपा ने उन्हें सर्बानंद सोनोवाल के मंत्रिमंडल में दूसरे सबसे पॉवरफुल सदस्य के तौर पर जगह दी थी। माना जा रहा है कि यदि भाजपा हिमंत को अवसर नहीं देती तो वह अपने भावी राजनीतिक करियर को ध्यान में रखकर कोई भी निर्णय ले सकते थे।