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असम: गरीबी से जूझ रहा है ये कोरोना वॉरियर, सरकार से मांगी स्थायी नौकरी

Sat, 02 Jan 2021 07:50 AM IST
दीप्ति मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
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कोरोना वॉरियर टुलू बांसफोड़ - फोटो : Social Media
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पिछले साल मार्च में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने देश में दस्तक दी थी। लोगों में कोरोना वायरस का खौफ पसरा हुआ था। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए देश में लॉकडाउन लागू था और लोग अपने घरों में कैद थे। कोरोना संकट के इस दौर में 31 वर्षीय स्वच्छता कार्यकर्ता टुलू बांसफोड़ चर्चा में आए थे। 

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असम के गोलपारा जिला में स्थानीय नागरिक अस्पताल के सभी कर्मियों ने संक्रमण के डर से कोरोना वायरस वार्ड को साफ करने से इनकार कर दिया था, तब टुलू बांसफोड़ ने इस मोर्चे को संभाला था। उन्होंने अपनी परवाह किए बिना कई महीनों तक अपनी ड्यूटी निभाई थी।

गोलपारा जिला प्रशासन ने उनके कार्य और समर्पण को देखकर उनकी तस्वीर साझा की थी। गोलपारा के डिप्टी कमिश्नर बताया कि जब जिले में पहला कोविड केस सामने आया था, लोगों में वायरस को लेकर कई तरह की समस्या थी और लोग काफी डरे हुए थे। तब टूलू ने आगे बढ़कर कोविड वार्ड की सफाई की थी। टुलू बांसफोड़ ने अपनी जान की परवाह किए बिना अस्पताल को साफ और सुरक्षित रखने का सराहनीय काम किया।इसके बाद टुलू देश भर में चर्चित हो गए थे। इस अनुकरणीय प्रयास के बावजूद वह अभी भी एक अस्थायी कर्मी के रूप में ही कार्य कर रहे हैं। उन्हें सरकार से नौकरी में स्थायी किए जाने की उम्मीद है।
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तीन हजार रुपये प्रतिमाह मिल रहा वेतन
कोरोना वॉरियर टुलू बांसफोड़ ने 10वीं तक की पढ़ाई की है। वह पिछले 14 सालों से गुवाहाटी से लगभग 150 किलोमीटर दूर असम के गोलपारा में अस्पताल में काम कर रहे हैं। उन्हें तीन हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा है।

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स्थाई किए जाने की उम्मीद 

टुलू बांसफोड़ के पिता की 2006 में मृत्यु हो गई थी, तब वह मात्र 17 साल के थे।वह अस्पताल में एक आकस्मिक कार्यकर्ता के रूप में नौकरी पाने में सफल रहे थे। तब से, वह उम्मीद कर रहे हैं कि उसे एक स्थायी  कार्यकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।

कोरोना काल में घर नहीं जाते थे बांसफोड़
 कोविड के मामलों में गिरावट के बाद अब बांसफोड़ फिर से अपने पुरानी ड्यूटी में वापस आ गए हैं। उन दिनों को याद करते हुए वो कहते हैं कि  घर में बूढ़ी मां, पत्नी और एक बच्चा है, इसलिए मैं  घर वापस नहीं जाता था ताकि वे लोग वो सुरक्षित रह सके। जब भी मरीज घबराते थे, तो मैं उन्हें खुश रखने का प्रयास करता था। दूर से ही बात कर के भरोसा देता था कि मैं उनकी सहायता के लिए हूं।

उनकी मां गीता बांसफोड़ ने कहा, ''मैं दिन भर रोती रहती थी, हम उसके बारे में चिंतित रहते थे। कई दिनों तक सो नहीं पाई थी। कई लोग हमें परेशान भी कर रहे थे क्योंकि हम गरीब हैं। टूलू की मां को भी 15 रुपये पेंशन के रूप में मिलता है।'

पति के काम को इनाम मिले 
टुल्लू की पत्नी डिंपल कलिता चाहती है कि उसे काम पर स्थायी कर दिया जाए। डिंपल ने कहा, मेरे पति की महत्वपूर्ण सेवा को देखते हुए उन्हें स्थायी किया जाए। उनके सराहनीय कार्य के लिए उन्हें इनाम मिले। मैंने कई बार उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए भी कहा, लेकिन वह नौकरी करना चाहते हैं। उन्हें काफी लगाव है।
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