असम कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। लगातार 15 साल तक यहां उसकी सरकार रही और तरुण गोगोई पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा थे, जिनके नाम और काम पर राज्य के लोग 'हाथ' का साथ देते थे। 2016 में सूपड़ा साफ होने के बाद कांग्रेस राज्य में अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगी। इस बीच कोरोना महामारी ने पूर्व मुख्यमंत्री और सबसे कद्दावर नेता तरुण गोगोई को भी छीन लिया। बीते साल नवंबर में उनकी मौत के बाद कांग्रेस कई धड़ों में बंट गई। अब कांग्रेस को भी यह समझ में आ चुका है कि सत्तासीन बीजेपी से वह अकेले संघर्ष नहीं कर सकती इसलिए कई छोटी पार्टियों से गठबंधन का रास्ता अख्तियार किया गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इन पांचों राज्यों के चुनावों को सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है।
परफ्यूम व्यापारी और लोकसभा सदस्य बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF), कम्यूनिस्ट पार्टी, मार्क्स कम्यूनिस्ट पार्टी, मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी और आंचलिक गण मोर्चा के साथ कांग्रेस का गणबंधन हुआ है। ब्रह्मपुत्र घाटी में निचले असम का एक बड़ा हिस्सा बंगाली भाषी मुसलमानों का घर है, जिसे AIUDF का गढ़ माना जाता है। मध्य असम की 30 सीट और बराक घाटी के तीन जिलों में इस पार्टी का दबदबा है। काग्रेस की नजर असम के ऊपरी हिस्से की करीब 45 सीट पर होगी। कांग्रेस अन्य दो क्षेत्रीय पार्टी असम जातिया परिषद और रायजोर दल के साथ भी संभावनाएं तलाश रही है, जो साथ में चुनाव लड़ रहे हैं। असम गण परिषद के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, '2016 के चुनाव में अजमल की AIUDF को 13 सीट मिली थी और बोडोलैंड पिपुल्स फ्रंट को 12 सीट। अगर इसे कांग्रेस के आंकड़े में जोड़ दिया जाए तो तीनों दलों का कुल वोट शेयर 57% था। अगर यही पैटर्न इस बार दोहराया जाता है, तो हमारे लिए सत्ता में वापसी करना मुश्किल हो सकता है।'
भाजपा असम में क्षेत्र और जाति जैसे तमाम मुद्दों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही है। एनआरसी, सीएए को असम में हवा देने से नहीं चूक रही है। अमित शाह बड़े विश्वास भरे अंदाज में लगातार मूल असमियों, हिन्दू मतदाताओं पर डोरे डालने के लिए घुसपैठियों को बाहर करने का भरोसा दिला रहे हैं। पिछली जनसभा में भी उन्होंने इस माहौल को जीवंत कर दिया। असम के तमाम बंगाली मूल के लोगों को नागरिकता के लिए दोबारा कागजी दस्तावेज जमा कराने की स्थिति आने के बारे में सोचने को मजबूर किया है। मंत्री हेमंत बिस्व तो ये तक कहने से नहीं चूके कि अगर कांग्रेस-एआईयूडीएफ सत्ता में आती है तो असम बांग्लादेश बन जाएगा। यहां घुसपैठियों का राज हो जाएगा।
मनमुटाव को दरकिनार कर अब कांग्रेस के सारे क्षत्रप एक छत के नीचे आ चुके हैं। बीजेपी को हराने के लिे जीतेन्द्र सिंह रणनीति बना रहे हैं और गौरव गोगोई, रिपुन बोरा, प्रद्युत बोरदोलोई, हितेश्वर सैकिया, सुष्मिता देव, रकीबुल हुसैन मैदान पर मेहनत कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी असम में जमकर मेहनत कर रहे हैं, उन्हें अपने सहयोगियों रायपुर पश्चिम के विधायक विकास उपाध्याय, राजनैतिक सलाहकार विनोद वर्मा, मीडिया सलाहकार रुचिर गर्ग और राजेश तिवारी का बखूबी साथ मिल रहा है।