फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराना पहला गुनाह': दिपके बोले- पांच दिन जेल में रहने के बाद भी आशु-सौरव के हौसले बुलंद

Mon, 19 Oct 2026 07:17 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल डेस्क, अमर उजाला, ढाका

सार

अभिजीत दिपके ने आशु और सौरव की दो पोस्ट साझा कर उनके संघर्ष और हौसले की तारीफ की है। उन्होंने बताया कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराना उनका पहला ‘गुनाह’ था और पीछे न हटना दूसरा। पांच दिन जेल में रहने के बाद भी दोनों मुस्कुराते हुए अदालत पहुंचे। दिपके के मुताबिक, दोनों ने अच्छी नौकरी और आरामदायक जिंदगी छोड़कर दूसरों के लिए संघर्ष का रास्ता चुना। आइए, विस्तार से जानते हैं दोनों पोस्ट के जरिए दिपके क्या कह रहे हैं...

विज्ञापन
दिपके ने आशु और सौरव पर क्या कहा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आशु और सौरव को लेकर दो पोस्ट किए। एक में उन्होंने सौरव-आशु की अदालत वाली तस्वीर पोस्ट की। इसमें उन्होंने लिखा कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराना आशु और सौरव का पहला गुनाह’ था, जबकि दूसरा ‘गुनाह’ अपने कदम पीछे खींचने से इनकार करना था। दिपके के मुताबिक, पांच दिन जेल में बिताने के बाद भी दोनों के हौसले नहीं टूटे। जब वे अदालत पहुंचे, तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। इसके पहले भी उन्होंने एक सौरव और आशु के लिए पोस्ट की।

विज्ञापन


दूसरी पोस्ट में उन्होंने कहा कि कई लोग अच्छी नौकरी, मोटी कमाई और सुरक्षित जिंदगी पाने का सपना देखते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने आराम से ज्यादा दूसरों की परेशानियों को महत्व देते हैं। अभिजीत दिपके की एक सोशल मीडिया पोस्ट में आशु और सौरव की ऐसी ही कहानी का जिक्र किया गया है। पोस्ट के मुताबिक, दोनों ने अपने सफल करियर और आर्थिक सुरक्षा को पीछे छोड़कर देश को बेहतर बनाने की उम्मीद में संघर्ष का रास्ता चुना। दिपके ने उनके फैसले को दूसरों के लिए खड़े होने की मिसाल बताया है।

आशु और सौरव ने अपनी आरामदायक जिंदगी क्यों छोड़ी?
अभिजीत दिपके की पोस्ट के मुताबिक, आशु कुछ साल पहले लंदन में एक बड़ी कंपनी में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी करते थे और लाखों कमाते थे। वहीं, सौरव देश की कानूनी व्यवस्था पर लिखते थे और अच्छी जिंदगी जी रहे थे। दोनों के पास सफल करियर, आर्थिक सुरक्षा और आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सुविधाओं से भरी जिंदगी छोड़ने का फैसला किया। पोस्ट में कहा गया है कि दोनों को ऐसा करने के लिए किसी ने मजबूर नहीं किया था और न ही उनसे इस तरह के त्याग की उम्मीद की जा रही थी।
विज्ञापन


दोनों ने संघर्ष का रास्ता कैसे चुना?
दिपके के मुताबिक, आशु और सौरव ने देश को बेहतर बनाने की उम्मीद में अपनी पुरानी जिंदगी पीछे छोड़ दी। उन्होंने सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने और अनिश्चितता का सामना करने का रास्ता चुना। पोस्ट में यह भी कहा गया है कि इस संघर्ष के दौरान दोनों को जेल तक जाना पड़ा। हालांकि, पोस्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वे किस आंदोलन या मामले में जेल गए थे। दिपके ने उनके फैसले को इस बात से जोड़ा कि उन्होंने केवल अपने भविष्य और सुविधाओं के बारे में सोचने के बजाय देश में दूसरे लोगों की स्थिति सुधारने की कोशिश की।

अभिजीत दिपके ने दोनों की किस बात की तारीफ की?
दिपके ने अपनी पोस्ट में कहा कि आशु और सौरव की सबसे खास बात यह है कि अच्छी सुविधाओं वाले परिवारों से आने के बावजूद उन्होंने उन लोगों के लिए लड़ने का फैसला किया, जिनके पास उनके जैसी सुविधाएं नहीं हैं। उनके मुताबिक, दोनों चाहते तो अपनी जिंदगी आराम से जी सकते थे और उन लोगों की परेशानियों से दूर रह सकते थे, जिन्हें वे जानते तक नहीं थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। पोस्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि दूसरों की मदद करने के लिए आगे आना और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना अपने आप में महत्वपूर्ण गुण है।

दूसरों के लिए अपनी सुविधाएं छोड़ने को क्यों बताया खास?
दिपके ने आशु और सौरव के उदाहरण के जरिए कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति के लिए खड़ा होना, जिसे हम जानते तक नहीं, इंसान के सबसे अच्छे गुणों में से एक है। उनके अनुसार, दूसरों की लड़ाई को अपनी लड़ाई समझना और किसी की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए खुद जोखिम उठाना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि आशु और सौरव ने अपने निजी हितों से आगे बढ़कर लोगों के लिए संघर्ष करने का फैसला किया। पोस्ट का मुख्य संदेश यही है कि समाज के लिए योगदान देने के लिए केवल अपने जीवन को बेहतर बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि दूसरों की मुश्किलों के प्रति संवेदनशील होना भी जरूरी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें