राज्य की सत्ता की हैट्रिक लगाने, राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा में अल्पसंख्यक मतों के लिए तुष्टीकरण वाली योजनाओं की भरमार लगाने और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को साथ लेने के बावजूद के चंद्रशेखर राव केसीआर का हर दांव उल्टा पड़ा। यहां तक कि पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) से भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) करने का भी लाभ नहीं हुआ और उसकी सीटें बीते चुनाव के मुकाबले आधी से भी कम रह गईं।
नतीजों से साफ है कि मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति ने केसीआर को दोहरा झटका दिया। अलग से आईटी पार्क, शादी मुबारक जैसी योजनाओं के एलान के बावजूद मुसलमान मतदाताओं ने राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए बीआरएस को उसी तरह किनारे कर दिया, जिस तरह कर्नाटक में उसने जेडीएस को किया था। दूसरा, तुष्टीकरण के चलते बहुसंख्यक मतों में समानांतर ध्रुवीकरण हुआ। मुसलमानों के करीब-करीब एकतरफा समर्थन और बीआरएस के मुकाबले सबसे मजबूत दल होने का सीधा लाभ कांग्रेस को मिल गया।
तुष्टीकरण की रणनीति बेअसर
केसीआर की योजना राज्य में जीत की हैट्रिक के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में गैरकांग्रेस-गैरभाजपा गठबंधन खड़ा करने की थी। केसीआर ने अपना सारा ध्यान मुस्लिमाें पर केंद्रित किया। मुसलमान शादीखाना निर्माण के लिए एक लाख रुपये की मदद, सिर्फ इसी वर्ग के लिए 296 आवासीय विद्यालय योजना शुरू की। राज्य की 13 फीसदी आबादी पर 12 हजार करोड़ रुपये खर्च किए। मुसलमानों के आरक्षण का दायरा 4 से बढ़ा कर 12 फीसदी करने का विधेयक पारित किया। ओवैसी से हाथ तक मिलाया। मुसलमानों के लिए अलग से आईटी पार्क की घोषणा भी की, लेकिन नतीजों ने उनके सपने पर ग्रहण लगा दिया।
अब बढ़ेंगी केसीआर की मुश्किलें
यह हार केसीआर के भविष्य की मुश्किलें बढ़ाएगी। कांग्रेस के रहते उसे विपक्षी गठबंधन में प्रवेश नहीं मिलेगा। केसीआर के परिवार के सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं। जांच तेज होने पर कुछ माह बाद होने जा रहे लोकसभा चुनाव में केसीआर की स्थिति और कमजोर होगी।
क्षेत्रीय दलों पर घटा मुसलमानों का भरोसा
कर्नाटक के बाद तेलंगाना के नतीजे बताते हैं कि मुसलमानों का क्षेत्रीय दलों पर भरोसा कम हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि यह बिरादरी कांग्रेस को एकतरफा वोट देकर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका मजबूत करना चाह रही है।
कर्नाटक में मुसलमानों के इसी वोटिंग पैटर्न ने कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई थी। तेलंगाना में इसकी पुनरावृत्ति हुई है।
भाजपा नहीं उठा पाई नाराजगी का लाभ
भाजपा की सीटों और मत प्रतिशत में जरूर इजाफा हुआ है, मगर वह केसीआर के खिलाफ मतदाताओं की नाराजगी का लाभ नहीं उठा पाई। वह न तो ठोस गठबंधन बना पाई और न ही पार्टी नेताओं के बीच खींचतान को कम कर पाई। वहीं, कांग्रेस को लेकर बीआरएस का सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी होने की धारणा बनी। उसे सत्ता विरोधी लहर का भी सीधा लाभ मिला।