कांग्रेस अपने मौजूदा मुख्यमंत्रियों को लगातार अपने विधानसभा चुनाव प्रचार अभियानों के दौरान प्रमुखता से समर्थन दे रही है और सार्वजनिक रूप से ऐलान कर रही है कि यदि पार्टी सत्ता में वापस लौटती है तो वे मुख्यमंत्री बने रहेंगे। सिद्धारमैया वह नया नाम है जो पार्टी की हारे हुए मुख्यमंत्रियों की सूची में जुड़ गया है।
इससे पार्टी के भीतर एक इस बात पर फिर से विचार शुरू हो गया है कि चुनाव अभियान के दौरान मुख्यमंत्री के चेहरे को स्पष्ट तौर से जाहिर करने के कीमत और फायदे क्या हैं।
2014 से कोई भी कांग्रेस सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री दोबारा सत्ता में नहीं लौट पाया है। मिसाल के लिए महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण, हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा, असम में तरुण गोगोई, केरल में ओमन चांडी, उत्तराखंड में हरीश रावत, हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह, मेघालय में मुकुल संगमा और मणिपुर में इबोबी सिंह।
हर बार कांग्रेस ने चुनावों की घोषणा की कि पार्टी के फिर से सत्ता में लौटने पर मौजूदा मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे।
इस मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर दो मत हैं। जहां एक धड़ा मुख्यमंत्री पद के चेहरे को जाहिर कर देने के पक्ष में है। वहीं दूसरा धड़ा मानता है कि इस कदम से अन्य उम्मीदवारों का दिल टूट जाता है जिसके कारण उनमें से कुछ या तो निष्क्रिया हो जाते हैं या पार्टी के हितों के खिलाफ काम करने लगते हैं।
एक वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ता ने नाम जाहिर नहीं करने के अनुरोध पर बताया, "एक बार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा हो जाने के बाद, अन्य दावेदार का जोश खत्म हो जाता है और किसी और के लिए काम करने से इनकार कर देते हैं। इस प्रक्रिया में, पार्टी हारने की दिशा में बढ़ती है।" उन्होंने कहा, "चुनाव के बाद शीर्ष पद पर पहुंचने की उम्मीद की वजह से हर कोई मेहनत करता है।"
इस धारणा के उलट कि कांग्रेस स्थानीय नेताओं को प्रोत्साहित नहीं करती है, पार्टी ने 2014 से लगातार अपने क्षेत्रीय कद्दावर नेताओं को सम्मान, प्रमुखता और समर्थन दिया है। पार्टी हाईकमान की रणनीति में स्पष्ट तौर पर आए इस बदलाव के बावजूद, हाल के वर्षों में यह सिर्फ एक बार 2017 में पंजाब में कारगर रही है। जब अमरिंदर सिंह सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री नहीं थे लेकिन 10 साल से सत्ता पर काबिज शिरोमणि अकाली दल- भारतीय जनता पार्टी शासन को चुनौती दे रहे थे।
अब कर्नाटक में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में सिद्धारमैया की नाकामी ने चुनाव अभियान की बागडोर सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री के हाथों में सौंपने की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जहां कांग्रेस ने कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) को अपना समर्थन दिया है और अभी भी राज्य में सरकार का हिस्सा बनने की उसकी उम्मीद बरकरार है। वहीं कांग्रेस महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बुरी तरह हारी। हालांकि मणिपुर और मेघालय में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन बहुमत हासिल करने के लिए पर्याप्त सीट संख्या नहीं थे।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या कांग्रेस में एक चुनाव मशीनरी की कमी है जिसकी तुलना बीजेपी से की जाती है।
बेंगलुरु स्थित अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में पब्लिक पॉलिसी के सहयोगी प्रोफेसर एक नारायण ने कहना है, "बीजेपी के पास एक सुचारू चुनाव मशीनरी है और इस तरह के बैकअप हम कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों में नहीं देख पाते हैं। कर्नाटक में सिद्धारमैया के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं थी, लेकिन फिर भी वह सत्ता में वापस नहीं आ सके क्योंकि उनके पास बीजेपी जैसे बैकअप और संसाधनों की कमी थी।"