मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इन्हीं मुद्दों के सहारे अपनी भविष्य की राजनीतिक यात्रा तय करना चाहते हैं, लिहाजा विशेषज्ञ इसे आम आदमी पार्टी का ‘सियासी बजट’ करार दे रहे हैं। माना जा रहा कि इन मुद्दों में कुछ पर सरकार बेहतर काम करने की कोशिश करेगी और आने वाले चुनावों में इसे जनता के सामने अपनी सफलता के रूप में पेश करेगी। लेकिन क्या यह बजट आम आदमी पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने वाला साबित होगा? क्या अरविंद केजरीवाल इन्हीं मुद्दों के सहारे भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर पाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा इस समय हिंदुत्व, राष्ट्रवाद के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास को अपनी ताकत बनाए हुए है। यानी अलग-अलग प्रकार के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए उसकी झोली में अलग-अलग मॉडल उपलब्ध हैं। जो मतदाता हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को प्रमुखता देते हैं उसके लिए तो उसके पास आदर्श है ही, जो मतदाता शिक्षा-स्वास्थ्य और रोजगार को अपनी प्रमुखता समझते हैं, उनके लिए भी विभिन्न योजनाओं के जरिए भाजपा सरकारें काम करती हुई दिखाई पड़ती हैं।
उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर भाजपा देश के आर्थिक विकास के लिए ‘मुफ्त वाली योजनाओं’ की विरोधी मानी जाती रही है। अटल सरकार और कुछ भाजपा राज्य सरकारों की कुछ योजनाओं में जनता को मुफ्त योजनाओं का लाभ अवश्य मिला, लेकिन प्रमुख रूप से वह विभिन्न मदों में सब्सिडी खत्म कर राष्ट्र को आर्थिक तौर पर सशक्त करने की पक्षधर रही है। उसने पूर्व में दूसरे सरकारों की मुफ्त योजनाओं का विरोध भी किया है। वह यूपीए सरकार की मनरेगा योजना की विरोधी तक रही है।
बदलते समय में वह मुफ्त की योजनाओं की पधधर होती दिखाई पड़ रही है। केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, अनाज योजना, आयुष्मान योजना और विभिन्न भाजपा सरकारों के कामकाज में भी यह शिफ्ट आता दिखाई पड़ रहा है। हो सकता है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की मुफ्त बिजली-पानी योजना की सफलता के कारण भाजपा की नीति में यह परिवर्तन आता दिखाई पड़ रहा हो। यदि यूपी चुनाव में सपा ने 300 यूनिट बिजली मुफ्त करने का वादा किया और भाजपा ने किसानों को मुफ्त बिजली देने का वायदा किया तो इसे केजरीवाल मॉडल का दबाव माना जा सकता है।
कहां ताकतवर हो सकते हैं केजरीवाल
जब भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों ही लगभग एक समान मुद्दों के सहारे ही जनता को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं तो इसमें बाजी किसके हाथ लेगेगी, इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय है कि अपनी भारी राजनीतिक काडर के सहारे भाजपा इस टर्फ पर बेहतर खेल सकती है। लेकिन दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों में जहां आम आदमी पार्टी ने अपना जनाधार बना लिया है, वहां आम आदमी पार्टी को बढ़त मिल सकती है। गुजरात जैसे राज्य में जहां भाजपा लंबे समय से लगातार सत्ता में है और विपक्ष के पास जनता को दिखाने के लिए कुछ नया नहीं है, वहां भी आम आदमी पार्टी लोगों को आकर्षित कर सकती है।
दिल्ली जैसे राज्य के पास आर्थिक संसाधन ज्यादा हैं, जबकि आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से उसे बेहद छोटे भूभाग पर विकास कार्य करने होते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के पास अपनी योजना को बेहतर ढंग से जमीन पर उतारने की संभावना बनती है, जबकि उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़ी आबादी और बड़े भूभाग पर इस प्रकार के विकास मॉडल को खड़ा करना बेहद मुश्किल कार्य हो सकता है। लिहाजा इस मामले में अरविंद केजरीवाल के पास बढ़त मिल सकती है कि वे अपने यहां बेहतर कामकाज कर दूसरे राज्यो के दलों-नेताओं को चुनौती दे सकें। केजरीवाल यह करते हुए दिखाई भी पड़ रहे हैं।
‘अपने ही दावों पर फेल हुई सरकार’
भाजपा प्रवक्ता खेमचंद शर्मा मानते हैं कि राजनीतिक सफलता के लिए जनता की नजह में विश्वसनीयता का सबसे ज्यादा असर होता है। उन्होंने कहा कि आज जनता पीएम मोदी की बात पर भरोसा केवल इसलिए करती है क्योंकि उन्होंने जो वायदे किए हैं, उसे लगातार पूरा करने का प्रयास किया है। जबकि अरविंद केजरीवाल की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रही है। उन्होंने जनता से किया अपना वायदा अब तक नहीं निभाया है।
उन्होंने अमर उजाला से कहा कि दिल्ली सरकार ने बजट को रोजगार बजट बताया है और पांच सालों में 20 लाख नौकरी देने का वादा किया है, जबकि आरटीआई से मिली जानकारी में सरकार ने स्वयं माना है कि पिछले सात साल के कार्यकाल में केजरीवाल सरकार ने केवल 440 सरकारी नौकरियां दी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के आंकड़े खुद सरकार के इरादों की पोल खोल देते हैं।
खेमचंद शर्मा ने कहा कि दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या प्रदूषण और पेयजल की है। सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कई उपाय करने के दावे किए थे, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई है। दिल्ली के बड़े इलाकों में आज भी लोगों तक पीने का पानी नहीं पहुंच पाता, अरविंद केजरीवाल सरकार ने हजारों करोड़ का बजट बनाकर भी लोगों को आज तक पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं करा पाई है। ऐसे में बजट में जो वादे किए गए हैं, वे उसका एक और झूठ का पुलिंदा हैं। हर दिल्लीवासी जानता है कि इसमें कोई वादा पूरा नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा कि इस तरीके से काम करने से केजरीवाल अपनी विश्वसनीयता लगातार खो रहे हैं जिसका राजनीतिक नुकसान उनको होना तय है।
उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भर्ती की गई नर्सों को अस्पतालों से हटा दिया गया है, शिक्षकों की भर्ती को रद्द कर दिया गया है, दिल्ली जल बोर्ड और डीटीसी विभाग में हजारों कर्मी कांट्रैक्ट बेसिस पर काम कर रहे हैं। यदि सरकार रोजगार देने का दावा करती है तो उसे सबसे पहले इन कर्मचारियों की छंटनी बंद कर इन्हें परमानेंट करना चाहिए।
‘रोजगार बजट नहीं, प्रचार बजट’
दिल्ली कांग्रेस उपाध्यक्ष मुदित अग्रवाल ने कहा कि केजरीवाल सरकार हर दिन किसी बहाने से अखबारों की खबरों में रहना चाहती है। अब लाखों नौकरियों के नाम पर कुछ दिन अखबारों में छपने का रास्ता खोज लिया गया है। बाद में विज्ञापन देकर इसे सही करार देने की कोशिश की जाएगी। लेकिन सच्चाई यह है कि 20 लाख रोजगार देने का वादा करने वाली सरकार अब तक स्कूलों में अध्यापकों और प्रिंसिपल तक की भर्ती नहीं कर पाई है। ऐसे में कोई यह विश्वास क्यों करे कि यह विकास और रोजगार का बजट है। उन्होंने कहा कि सरकार इसके बहाने अपने प्रचार का रास्ता बना रही है।