अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है। प्रदेश के पूर्वी हिस्से में अब सड़कों और पुलों का जाल बिछाया जा रहा है। छह दशक पहले जहां पहुंचने के लिए 16 से 18 दिन पैदल चलना पड़ता था, वह सफर अब चंद घंटों में सिमटकर रह जाएगा। इससे सीमावर्ती इलाकों में पर्यटन का विकास होगा और इससे यहां के स्थानीय लोगों के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आएगा। 1962 में दो हफ्ते से अधिक का सफर तय करने को विवश भारतीय सेना अब आसानी से अग्रिम मोर्चे तक पहुंचेगी। इतना ही नहीं सड़कों और पुलों के बनने से भारतीय सेना की ताकत भी बढ़ेगी। अगर दुश्मन देश ने 1962 जैसी कोई हरकत की कोशिश की तो उसे ऐसा जवाब मिलेगा कि वह सदियों-सदियों इसे भुला नहीं पाएगा।
पगडंडियों होकर पड़ा गुजरना पड़ता था, 1962 में हुई थी मुश्किल
स्थानीय लोग बताते हैं कि आजादी के बाद से ही केंद्र की पिछली सरकारों ने पूरे पूर्वोत्तर के विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। चीन के साथ सीमाएं हमारी बहुत लंबी है, इसके बावजूद सड़क और पुल बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका फायदा 1962 में चीन ने उठाया। उसने तवांग और वॉलोंग सेक्टर पर 1962 में हमला बोल दिया। स्थानीय लोग बताते हैं तेजु से थोड़ी आगे से पहाड़ी रास्ता शुरू हो जाता है। इस पहाड़ी के नीचे बहती है लोहित नदी। लोहित नदी के साथ-साथ बनी पगडंडियों से होकर भारतीय सेना के जवानों को अग्रिम मोर्चों पर जाना पड़ता था। इसमें 16 से 18 दिन का वक्त लगता था। इतनी लंबी और थकान भरी यात्रा करने के बाद सैनिकों को दुश्मन देश की सेना से लोहा लेना पड़ता था। कितना मुश्किल रहा होगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने इससे सबक नहीं लिया। त्वरित कार्यवाही नहीं की। बहुत धीमी रफ्तार से काम किया गया।
बदली स्थिति, अब युद्धस्तर पर विकास के काम
स्थानीय निवासी बाबूराम स्थिति बदलने की पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा, वैसे तो 2014 से ही यहां पर बदलाव आने लगा था। हालांकि, पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसा की घटना के बाद एक दम से यहां पर स्थिति बदली। सड़कों और पुलों का जाल बिछाया जा रहा है। संकरी सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है। कई जगह बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) कहीं पर भारतीय सेना और कई जगह राज्य सरकार सड़कों का निर्माण करा रही है। तेजु में रहने वाले बिकु के मुताबिक, तेजु से हाईलोंग तक सड़क का काम बहुत तेजी से हुआ है। अनुमान है कि 2024 के अंत तक यहां पर टू वे रोड बनकर तैयार हो जाएगा। इसी तरह से हाईलोंग से वॉलोंग तक भी तेजी से सड़क और पुलों का निर्माण हो रहा है। सभी पुराने पुलों की जगह नए पुल बनाए गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक तेजु से किबिथू और काहो तक टू वे सड़क बनकर तैयार हो जाएगी। इसके बाद 18 दिनों की पैदल यात्रा चार से साढ़े चार घंटों में सिमट जाएगी।
अरुणाचल प्रदेश
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आजादी के बाद पहली बार पुल की सुविधा
सीमा पर बसे पहले गांव काहो और दिचु सहित 50 से अधिक गांव वालों को पहली बार पुल मिलने जा रहा है। यहां रहने वाले लोग अब तक झूला पुल से ही गुजारा कर रहे थे। इस पुल पर किसी भी समय बड़ा हादसा होने का खतरा मंडराता रहता था। इसके अलावा काहो और दिचु जाने के लिए करोति होकर जाना पड़ता है। वहां पर भी एक झूला पुल है। अगर इस पुल पर कुछ हो जाता है तो पूरे इलाके का संपर्क देश से टूट जाएगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने वॉलोंग में लोहित नदीं पर पुल बनाने का फैसला लिया। 2021 में मंजूरी के बाद पुल पर युद्धस्तर पर काम हो रहा है। 2025 तक यह पुल बनकर तैयार हो जाएगा।
अरुणाचल प्रदेश दिल्ली से और करीब आया
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश जाने के दो रास्ते हैं। एक तेजपुर और दूसरा डिब्रूगढ़। पूर्व के लोग डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करते हैं जबकि पश्चिम के लोग तेजपुर की तरफ से प्रवेश करते हैं। असम के डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश के शहर रोइंग जाना हो, पासीघाट या धेमाजी जाने के लिए फेरी लेकर ब्रह्मपुत्र नदी में सफर तय करना पड़ता था। इसमें करीब 12 से 24 घंटों का समय लगता था। आज यह समय घटकर तीन से चार घंटे हो गया है। 2014 के बाद असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर दो बहुप्रतीक्षित पुल बने। तिनसुकिया जिले में धौला-सदिया (भूपेन हाजरिका पुल) और डिब्रूगढ़ जिले में बोगीबिल पुल का निर्माण हुआ। आजादी से असम और अरुणाचल प्रदेश के लोग इनका इंतजार में थे। इनके बनने से दिल्ली से अरुणचाल प्रदेश की दूरी काफी कम हो गई है।
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धौला-सदिया पुल
इस पुल का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2017 को किया था। इस पुल के बनने से डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश के रोइंग शहर पहुंचने के लिए फेरी से जाना पड़ता था। इसके लिए 12 से 14 घंटे का समय लगता था। लेकिन अब महज तीन-साढ़े तीन घंटे में ही लोग रोइंग पहुंच जाते हैं। देश के इस सबसे लंबे पुल की लंबाई 9.15 किलोमीटर है। यह पुल 2056 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ है।
डिब्रूगढ़ का बोगीबिल पुल
यहां से अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट, आलोंग शहर और धेमाजी जाते हैं। पहले लोग सुबह यहां से निकलते थे और देर शाम पहुंचते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर, 2018 को ब्रह्मपुत्र नदी पर बने देश के सबसे लंबे डबल डेकर रेल और सड़क पुल का उद्घाटन किया। इस पुल की लंबाई करीब 4.94 किलोमीटर है। सामरिक दृष्टिकोण से भी इस पुल का बड़ा महत्व है। आपात स्थिति में सेना के भारी टैंक को इसकी मदद से मोर्चे तक आसानी से पहुंचाया जा सकेगा। पुल के बनने से धेमाजी से डिब्रूगढ़ की दूरी महज 100 किलोमीटर रह गई, जो सिर्फ़ दो घंटे में पूरी होती है। इससे पहले दोनों शहरों का फासला 500 किलोमीटर का था। इसे पूरा करने में 24 घंटे का वक्त लगता था। पुल बनने के बाद असम के तेजपुर पहुंचने में अब महज सात घंटे लगते हैं। पहले 18 घंटे लगते थे।
चार दिन का पैदल रास्ता, अब 4 घंटे का सफर
अरुणाचल प्रदेश के चांगलांज जिले में बसे शहर- विजय नगर पहुंचने में पहले चार से पांच दिन तक पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। अरुणाचल प्रदेश में बसे शहर मियाव से इस शहर की दूरी करीब 165 किलोमीटर है। हालांकि, अब सड़क बनने से यात्रा का समय चार दिन से घट कर चार से साढ़े चार घंटे रह गया है। यह रास्ता नामदफा नेशनल पार्क से होकर गुजरता है।