सरकार ने 15 नवंबर, भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को हर साल जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। यह फैसला जनजातीय गौरव, विरासत, परंपरा, संस्कृति और भारत की उपलब्धियों को प्रदर्शित करता है, जो आत्मनिर्भर भारत की भावना से ओत-प्रोत है। यह वैश्विक मंच पर भारत की छवि को भी मजबूत करता है। आजादी के इस अमृतकाल में, देश ने संकल्प लिया है कि वह भारत की जनजातीय विरासत एवं परंपराओं तथा उनकी वीरता की कहानियों को और अधिक भव्य रूप से व्यापक पहचान दिलाएगा।
भारत में रहने वाली दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जनजातीय आबादी इसे एक विविध एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला देश बनाती है। नौजवान आदिवासी शिक्षा, खेल जैसे क्षेत्रों में मिल रहे अवसरों का पूरे समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ लाभ उठा रहे हैं। वे पद्म पुरस्कार जीत रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रहे हैं। जनजातियों के हालात बेहतर हो रहे हैं।
अब देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं। इस पद पर उनकी नियुक्ति जनजातीय समाज के प्रति हमारी सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है। मोदी सरकार के आठ वषों के दौरान हर जनजातीय मसला सुलझाया गया है, जो हमारे सिद्धांत ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के भाव को प्रदर्शित करता है।
मुख्यधारा से जोड़ना आवश्यक : जब मैं भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने के बारे में विचार करता हूं तो महसूस होता है कि जनजातीय समाज को विकसित करना, उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाना, उनके महत्वपूर्ण संस्थागत मसलों को सुलझाना और उनकी सांस्कृतिक विरासत को महत्व देते हुए समाज की मुख्यधारा से जोड़ना अत्यधिक जरूरी है।
विकास के लिए शिक्षा अहम : पीएम ने विकास की जिस रणनीति पर जोर दिया है, वह समग्र शिक्षा है। जनजातीय समाजों में, विशेष रूप से लड़कियों लिए शैक्षिक उन्नति की परंपरा को प्रोत्साहन जरूरी है। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को तैयार करने की अपनी चुनौतियां हैं।
स्थायी आजीविका को बढ़ावा : भारत@2047 विजन गांवों-शहरों में जरूरी सुविधाएं प्रदान करना और उन्नत बुनियादी ढांचे का निर्माण कर खुशहाली को हासिल करना है। मेरे मंत्रालय ने तय किया है कि इस समाज के स्थायी आजीविका, आय का सृजन, स्वास्थ्य और उनकी विविध जातीय संस्कृतियों को बढ़ावा देना आवश्यक है।