उद्धव सरकार ने देशमुख पर लगाए गए आरोपों की जांच रिटायर्ड जज से कराने की घोषणा की थी, तभी यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि अब देशमुख से इस्तीफा मांगा जाएगा, यह निष्प्क्ष जांच के लिए जरूरी था। साथ ही लोगों के बीच यह संदेश भी जाएगा कि राज्य सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर गंभीर है।
देशमुख पर कार्रवाई के पक्ष में नहीं थी एनसीपी
पार्टी नेताओं के मुताबिक, एनसीपी का शीर्ष नेतृत्व देशमुख के खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई नहीं चाहता था। हालांकि, इस बात को लेकर सहमति थी कि बाद में देशमुख को गृह मंत्रालय से किसी और विभाग में भेज दिया जाएगा, लेकिन इस बीच हाईकोर्ट के आदेश ने एनसीपी को मजबूर कर दिया कि वह देशमुख का इस्तीफा ले। ऐसे में इस्तीफा लेने में पार्टी की ओर से हुई देरी ने एनसीपी भद्द पीट दी।
यहां से अलग हुईं राहें
बता दें कि 25 फरवरी को जबसे मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक से भरी गाड़ी मिली, तबसे ही एमवीए सरकार और एनसीपी अलग-अलग नजर आ रही है। इसकी शुरुआत हुई पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को लेकर अलग-अलग रुख से।महाराष्ट्र सरकार ने एंटीलिया केस की जांच कर रहे मुंबई क्राइम ब्रॉच के निलंबित पुलिस अधिकारी को हटाने में देरी किए जाने और वाजे की गिरफ्तारी पर अलग-अलग रुख देखने को मिला था।
उद्धव सरकार के अंदर एक राय की कमी उस वक्त भी दिखी, जब मुंबई पुलिस कमिश्नर और देवेंद्र फडणवीस ने अनिल देशमुख के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसके पीछे भी वजह मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और एनसीपी चीफ शरद पवार के बीच एकमत न होना ही था। एमवीए नेताओं की मानें, तो ठाकरे चाहते थे कि एनसीपी देशमुख को कैबिनेट से हटाए। हालांकि, दूसरी तरफ एनसीपी नहीं चाहती थी कि वह देशमुख पर लगे आरोपों पर तुरंत कार्रवाई करे।
पवार से नहीं थी ये उम्मीद
एक मीडिया संस्थान से बातचीत मे राजनीतिक विशेषज्ञ हेमंत देसाई ने कहा कि सहयोगी पार्टियों के बीच आपसी तालमेल की कमी साफ दिखी। स्थिति को संभालने का रवैया ढुलमुल था। सरकार को बिना देरी मामले की जांच करवाने का आदेश देना चाहिए था और जब जांच की घोषणा की गई थी, तो देशमुख से उसी समय इस्तीफा लेना चाहिए था ताकि उन्हें गृह विभाग से दूर रखा जा सके। यह समझना मुश्किल है कि शरद पवार जैसे मंझे राजनेता ने यह क्यों नहीं किया। देसाई ने कहा कि सीबीआई की एंट्री के बाद चीजें एमवीए सरकार के कंट्रोल में नहीं रहीं क्योंकि अब केंद्रीय एजेंसी अपनी तरह से जांच करेगी।
एमवीए के पास बचा है विकल्प?
महाराष्ट्र सरकार पिछले करीब एक महीने से राजनीतिक भरपाई करने में जुटी है। हालांकि इसमें सफलता हाथ नहीं लगी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब स्थिति पहले से ज्यादा जटिल हो गई है। एक वरिष्ठ एनसीपी नेता ने बताया कि फिलहाल सबसे पहली योजना सीबीआई जांच वाले हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने की है। हालांकि, महा विकास अघाड़ी इसपर फैसला करेगी कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार फैसले को चुनौती देगी या फिर देशमुख खुद इसके खिलाफ अर्जी देंगे।
महाविकास अघाड़ी में सहयोगी कांग्रेस भी राजनीतिक घमासान और खुद को तवज्जो नही मिलने से नाराज है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने पूरे घटनाक्रम पर कहा कि यह तीन पार्टियों वाली सरकार है। जो भी होता है, सभी सहयोगियों को उसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। वाजे-देशमुख विवाद को एनसीपी का मामला माना जा रहा है। एनसीपी ने सीएम से विचार-विमर्श किया क्योंकि उन्हें करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हमारी राय जानने की जहमत नहीं उठाई। अगर यह एक राजनीतिक लड़ाई है, तो तीनों पार्टियों को साथ मिलकर लड़ना होगा। देशमुख के इस्तीफे से एमवीए की समस्याएं खत्म होना मुश्किल है बल्कि ये और बढ़ेंगी।