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क्या अम्मा दोहरा पाएंगी एमजीआर का करिश्मा?

Tue, 03 May 2016 03:05 PM IST
इमरान क़ुरैशी/ बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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तमिलनाडु और देश के अन्य हिस्सों में भी लोग तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयराम जयललिता (जिन्हें लोग अम्मा कहते हैं) को हमेशा ऐसी महिला के रूप में देखते हैं जो आक्रामक, कठोर और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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उनके राजनीतिक विरोधी भी इस बात को मानने से इनकार नहीं करेंगे कि उनकी अपनी पार्टी और सरकार पर तगड़ी पकड़ है। और कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि वह देश में सबसे ताकतवर महिला राजनेताओं में से एक हैं।

हालांकि वह ऐसी नेता हैं जो दूसरों की तरह लोगों से, वोटरों से संवाद नहीं करती- सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करने के अलावा। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक भगवान सिंह कहते हैं, "जयललिता के व्यक्तित्व का यह रहस्यमयी हिस्सा है।
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यही उनकी विशेषता भी है। उन्होंने एक बार मुझे बताया था कि एक अकेली महिला के लिए राजनीति में जिंदा रहना और विवादों और घोटालों से दूर रहना कितना मुश्किल है। जो भी उनके नज़दीक आया उसने उनका इस्तेमाल किया। इसलिए उन्होंने सभी खिड़की-दरवाजे बंद कर लिए।"

वह कहते हैं, "लेकिन उनके राजनीतिक जीवन को देखिए। वह आक्रामक, अहंकारी और कठोर रही हैं। लेकिन इन्हीं खासियतों के चलते लोग उन्हें पसंद करते रहे हैं। उन्होंने द्रविड़ आंदोलन के बुजुर्ग डीएमके के करुणानिधि से टक्कर ली। लोगों को यह अच्छा भी लगा। लोग उन्हें 'लोहे की तितली' भी कहते हैं।"

68 वर्षीय जयललिता ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में की थी। घर को चलाने के लिए उनकी मां ने उन्हें जबरन फ़िल्मों में उतारा था।

तब जयललिता पढ़कर वकील बनना चाहती थीं। लेकिन एमजीआर के साथ उनकी जोड़ी पसंद किए जाने के बाद उनकी हिट फ़िल्मों की संख्या बढ़ती गई। एमजीआर ने डीएमके से नाता तोड़कर एआईएडीएमके बनाई।

वसंती (जिनकी लिखी जयललिता की जीवनी को प्रकाशित होने से रोक दिया गया था) कहती हैं, "यह पूरी तरह दृढ़ता का काम था। एमजीआर के नज़दीकी सहयोगियों ने सुनिश्चित किया कि जयललिता मंत्री न बन पाएं। इस पर एमजीआर ने उन्हें प्रचार सचिव बना दिया।

इसी वजह से वह लोगों के बीच लोकप्रिय हुईं। उनके करिश्मे से भीड़ खिंचने लगी और एमजीआर जानते थे कि इससे उनकी पार्टी को बढ़ने में मदद मिलेगी। वह बहुत आत्म-निर्भर व्यक्ति हैं। उनकी ख़ास बात है पलटवार करना।"

अम्मा ने खाई थी सीएम बनने की कसम

वसंती के अनुसार इससे उनके 'विपक्षियों को खत्म करने' के संकल्प का पता चलता है। भगवान सिंह कहते हैं, "1989 में जब उन्होंने विधानसभा में करुणानिधि के बजट पेश करने के दौरान आपत्ति जताई थी तो वहां अफरा-तफरी मच गई थी। और एक बार तो ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी कि डीएमके के एक वरिष्ठ सदस्य ने उनके कपड़े फाड़ दिए थे। तब उन्होंने कसम खाई थी कि वह विधानसभा में बतौर मुख्यमंत्री ही आएंगी।"

वसंती कहती हैं, "वह पुरुष राजनेताओं के किए गए अपमान को नहीं भूल सकतीं। तमिल राजनीति और सिनेमा में भी लिंगभेद बहुत ज़्यादा है। विधानसभा में उस घटना के बाद वह बतौर मुख्यमंत्री ही वापस आईँ।"

लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल का भूत अब भी उनका पीछा कर रहा है। इसी दौरान (1991-96) उनके कामों या अनदेखियों की वजह से आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ था। मामले के उतार-चढ़ावों की वजह से उन्हें दो बार (2002 और 2015) अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनी पड़ी।

2014 में वो देश की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बनीं जिन्हें दोषी ठहराए जाने की वजह से सरकारी पद के लिए अयोग्य ठहराया गया। कर्नाटक हाई कोर्ट से राहत मिलने के बाद पिछले साल वे एक उप-चुनाव जीतकर फिर से मुख्यमंत्री बन पाईं।
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'अम्मा मेरा ख्याल रखती हैं वह भ्रष्ट नहीं हैं'।"

उनके कार्यकाल के आख‌िरी चरण में उनके सामाजिक भलाई के कार्यक्रम लोकप्रिय हुए। 'अम्मा कैंटीन' जितना संभव हो उतना सस्ता खाना देती हैं। दूसरे मुफ्त उपहारों ने घर के करीब-करीब हर सदस्य को कुछ राहत दी है।

भगवान सिंह कहते हैं, "यह सही है कि जो भी उनकी आलोचना करता है उसके ख‌िलाफ मानहानि के मामले दायर किए गए हैं। वह आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। लेकिन अगर आप ग्रामीण इलाकों में लोगों से बात करें तो आपको मजेदार बात सुनने को मिलती है। हाल ही में कुछ लोगों ने मुझे कहा, 'अम्मा मेरा ख्याल रखती हैं। वह भ्रष्ट नहीं हैं'।"

तमिलनाडु में एमजीआर की सरकार को छोड़कर कभी भी सत्ताधारी दल को चुनाव में जीत नहीं मिली है। एमजीआर की सरकार ही इसका अपवाद है। एक बार तो इसलिए क्योंकि इंदिरा गांधी ने उन्हें बर्ख़ास्त कर दिया था और दूसरी बार इसलिए क्योंकि वे गंभीर रूप से बीमार थे और अमरीका में उनका इलाज चल रहा था।जयललिता इस बार अपने कम-लोकप्रिय सहयोगियों को चुनाव लड़ने का मौक़ा देकर इसे दोहराने की कोशिश कर रही हैं।

दूसरे शब्दों में सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों में जयललिता के नाम पर ही चुनाव लड़ा जाएगा। यह भी एक रिकॉर्ड ही होगा क्योंकि गठबंधनों की वजह से अभी तक किसी भी पार्टी ने सभी सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। वसंती कहती हैं, "उनकी पार्टी में सब जानते हैं कि वह सिर्फ़ उनकी वजह से ही हैं। वही भीड़ इकट्ठी करती हैं और वोट लाती हैं।" इससे स्पष्ट हो जाता है कि क्यों एआईएडीएमके के विधायक मंत्री पद की शपथ लेने के बाद अम्मा के आगे दंडवत होते हैं।
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