अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने ही थे। पहली परीक्षा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में थी। वैचारिक साम्यता के बावजूद शिवसेना जब सीटों को लेकर ज्यादा मोल-भाव करने लगी तो भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा। ये फैसला अमित शाह का था। पार्टी व संघ के कई दिग्गज उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन वह अपने फैसले पर आगे बढ़े।
चुनाव के बाद जब सरकार बनाने के लिए संख्या बल कम पड़ी तो शिवसेना को फिर साथ लेने में गुरेज नहीं किया। शाह की यही खासियत है, फैसला लेना और साहस के साथ जिम्मेदारी भी लेना। भाजपा के घोषणा पत्र में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के मुद्दे को शामिल करने पर पार्टी में एक राय नहीं थी। कुछ की यह राय भी थी कि इससे पूर्वोत्तर में आग लग जाएगी, लेकिन शाह का कहना था कि इसके बिना हम दूसरों से अलग कैसे दिखेंगे। नतीजों ने यहां भी उन्हें सही साबित किया।
भाजपा संगठन की मजबूती और विस्तार में शाह की यही दृष्टि काम आई। लक्ष्य को दृढ़ता के साथ हासिल करने में उनका भरोसा है। वह दुस्साहस की हद तक साहस दिखाते हैं। और, यह चल इसलिए जाता है कि भले ही कितने आरोप लगें, निजी जीवन में वे सात्विक हैं। सुबह 5 बजे उठना, 8 बजे तक काम पर लग जाना और देर रात तक काम में जुटे रहना उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या है। वह इतिहास और ज्योतिष के जानकार हैं। किसी भी राजनीतिक दल के वह पहले अध्यक्ष हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में पूरे भारत के तीन दौरे किए हैं।
बंगाल में जो नतीजे आए हैं, वे यूं ही नहीं है। बीते एक साल में उन्होंने 72 दिन बंगाल में गुजारे और पार्टी को बूथ स्तर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मशक्कत की। 2014 में हारी हुईं 120 सीटों पर एक साल पहले से लक्ष्य बनाकर तैयारी शुरु की।
सबसे बड़ी खासियत बेबाकी है। उनके दिल में जो है, उसे छिपाने की कोशिश नहीं करते। यह भी चिंता नहीं रहती कि उनकी स्पष्टवादिता से कौन खफा हो जाएगा? ईश्वर में भरोसा है, लेकिन आडंबर में नहीं। ज्योतिष के जानकार होने के बावजूद अंधविश्वासी नहीं हैं। उनके ड्राइंग रूम में वीर सावरकर और चाणक्य के फोटो लगे हैं। पार्टी को 10 करोड़ी बनाने और उनसे लगातार संवाद व संपर्क ने ही भाजपा को यह ऐतिहासिक जीत दिलाने में मदद की है।