भाजपा नेता अमित शाह ने शुक्रवार को बिहार के सीमांचल इलाके में पूर्णिया में एक जनसभा को संबोधित किया। बिहार में जेडीयू-आरजेडी सरकार के गठन के बाद यह उनकी पहली बिहार यात्रा थी। इस जनसभा में उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार की जोड़ी पर जमकर हमला किया और लगभग एक महीने पुरानी सरकार में बिहार में भय का माहौल होने की बात कही। इस रैली को भाजपा की 2024 लोकसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन महत्त्वपूर्ण है कि अमित शाह ने ‘मिशन बिहार’ की शुरुआत सीमांचल से ही क्यों की?
सीमांचल का यह इलाका देश की सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मुस्लिम बहुल आबादी वाला यह इलाका असम और पश्चिम बंगाल की सीमा से जुड़ा हुआ है। पडोसी देश बांग्लादेश से आने वाले अवैध घुसपैठियों की यह सबसे पसंदीदा जगह है, क्योंकि यहां की मुस्लिम बहुल आबादी के बीच वे यहां आसानी से घुलमिल जाते हैं। स्थानीय एजेंट्स की शह पर वे यहां आसानी से फर्जी पहचान पत्र बनवाने में सफल हो जाते हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी उनकी पहचान कर पाना आसान नहीं होता। यहां से बांग्लादेशी घुसपैठिए असम और पश्चिम बंगाल सहित देश के दूसरे इलाकों में आसानी से चले जाते हैं।
बिहार के सीमांचल इलाके में पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले जिले आते हैं। इनमें कुल 24 विधानसभा सीटें हैं। यहां लगभग आधी आबादी (47 फीसदी) मुसलमानों की है। इन पर लंबे समय से लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की पकड़ बनी हुई है। मुस्लिम मतदाताओं पर अपनी पकड़ के कारण यहां सबसे ज्यादा सफलता इन्हीं दलों को मिलती रही है।
हालांकि, लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने बेहतर रणनीति के साथ चुनाव लड़ा और किशनगंज को छोड़कर बाकी सभी सीटों पर जीत हासिल की थी। बदले राजनीतिक समीकरणों में भाजपा को RJD-JDU महागठबंधन से इस क्षेत्र में कड़ी चुनौती मिल सकती है। एक-एक सीट को अपनी रणनीति के दम पर संभालने के लिए मशहूर अमित शाह ने इसी क्षेत्र से अपनी चुनावी समर की शुरुआत कर नीतीश कुमार को यह इशारा दे दिया है कि बदले समीकरणों में भी वे हार नहीं मानेंगे और इस पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने की पुरजोर कोशिश करेंगे।
वरिष्ठ राजनीतिक आलोचक सुनील पाण्डेय ने अमर उजाला से कहा कि नीतीश-लालू गठबंधन के कारण इस बार भाजपा को सीमांचल में सफलता मिलनी मुश्किल हो सकती है। मुसलमान मतदाताओं पर इन नेताओं की पकड़ पहले ही मजबूत है। मुसलमानों के अलावा इस क्षेत्र में पिछड़ी जाति के मतदाता सबसे ज्यादा संख्या में रहते हैं, लिहाजा जातीय समीकरणों के सहारे महागठबंधन यहां बड़ी सफलता प्राप्त कर सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी को इस क्षेत्र में सफलता मिल गई थी।
माना जाता है कि ओवैसी फैक्टर के कारण ही भाजपा-जेडीयू गठबंधन को लाभ मिला और वह सत्ता तक पहुंच गई, जबकि सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बाद भी राजद सत्ता से दूर रह गई। उसके नेता अभी से मुस्लिम मतदाताओं से पिछली बार वाली गलती न दोहराने की अपील करते हुए देखे जा रहे हैं। यदि वे अपने मतदाताओं को अपनी बात समझाने में सफल रहते हैं तो महागठबंधन इस क्षेत्र में दोबारा मजबूत हो सकता है।
लेकिन इन परिस्थितियों के बाद भी भाजपा के लिए यहां स्थितियां पूरी तरह प्रतिकूल नहीं हुई हैं। अमित शाह इन परिस्थितियों में भी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में सफलता हासिल करते रहे हैं। उनकी नजर यहां के 53 फीसदी हिंदू मतदाताओं पर रहेगी, जिसे वे अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकते हैं। बिहार में सांप्रदायिक आधार पर मतों का विभाजन अब तक नहीं हुआ है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहां भी हनुमान यात्राओं और राम शोभा यात्राओं की बाढ़ आई हुई है। इससे मतदाताओं को एक हद तक प्रभावित करना संभव हो सकता है।
सुनील पांडेय ने कहा कि लालू-नीतीश गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा के मोर्चे पर मिल रही है। अराजक तत्त्वों के कारण इस क्षेत्र में अपराध होते हैं और इससे जनता त्रस्त है। पडोसी देशों से आने वाले घुसपैठियों-अपराधियों के कारण भी यहां के हालात बिगड़े हैं और लोगों की जान-माल को लेकर चिंता बढ़ी है। यदि नीतीश सरकार अपराध पर नियंत्रण पाने में असफल रहती है, तो भाजपा को इस क्षेत्र में भी बड़ी सफलता मिल सकती है। अमित शाह ने अपनी पूर्णिया की रैली में सुरक्षा के मुद्दे पर ही सबसे ज्यादा हमला बोला है तो उसका कारण आसानी से समझा जा सकता है। यदि सुरक्षा के मुद्दे के बूते भाजपा को सीमांचल में बड़ी सफलता मिल जाए तो इस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये।