3. संगति का प्रबंधन
तीसरी बात है- सी यानी कंपनी मैनेजमेंट। आप किनके साथ हैं, इससे आपके व्यवहार का पता चलता है। आप जिंदगी में किन शीर्ष पांच लोगों के साथ जुड़े हैं, इससे आपके व्यक्तित्व का पता चलता है। आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया था। एक बार उनके ड्राइवर ने उनके जैसा भाषण दे दिया, लेकिन श्रोताओं में से किसी ने ड्राइवर ने सवाल पूछ लिया। उसने कहा कि यह तो आसान है, मेरा ड्राइवर भी जवाब दे देगा। कभी-कभी आपकी जिंदगी में तनाव नहीं रहता, लेकिन फिर तनाव आता कैसा है- संगति से। संगति आपको बना सकती है, बिगाड़ भी सकती है। मौजूदा पीढ़ी में संवेदनशीलता की कमी है। वे गैजेट्स, स्मार्टफोन्स की संगत में रहते हैं, जिनमें संवेदनशीलता ही नहीं रहती। टेक्नोलॉजी खराब नहीं है। वह आपकी मालिक बनेगी तो बिगाड़ेगी, वह आपकी सेवा में रहेगी तो ठीक रहेगी।
4. रिश्तों का प्रबंधन
चौथी बात है- आर यानी रिलेशनशिप। कई बार शीर्ष पर पहुंचे लोग बहुत अकेले होते हैं। अमीर लोगों के घर में कमरे ज्यादा होते हैं, लेकिन रहने वाले सिर्फ दो लोग होते हैं। ऐसे लोग रिश्तों को नहीं संभाल पाए। अंगूर गुच्छे में भी मिलते हैं और बिखरे-बिखरे भी मिलते हैं। गुच्छे में मिलने वाले अंगूर की कीमत बिखरे अंगूरों से ज्यादा होती है। चीजें टूट जाएं तो मरम्मत हो सकती है। दिल टूट जाए तो कैसे मरम्मत होगी? हम अक्सर लोगों को माफ नहीं कर पाते। कोई हमें अपशब्द कह दे, हमसे राजनीति करे तो हम उसे माफ नहीं कर पाते। हमारा अहम् हमें ऐसा करने से रोकता है। आपको यह तय करना होगा कि ज्यादा जरूरी क्या है? बहस में जीतना या रिश्तों को संभालना? दूध और पानी के बीच दोस्ती होती है। दूध पानी से कहता है कि तुमने खुद को मुझमें मिला लिया? पानी कहता है कि जब हमें उबाले तो मैं पहले उड़ जाऊंगा। दूध और पानी तभी अलग हो सकते हैं, जब उनमें कोई नींबू निचोड़ देते हैं। कोई भी रिश्ता स्वाभाविक मौत नहीं मरता, अहम् उसकी हत्या कर देता है।
5. भावनाओं का प्रबंधन
पांचवीं बात है- ई यानी इमोशंस। भावुकता का प्रबंधन। भावनाएं होना जरूरी है। अब कॉर्पोरेट में आईक्यू और साइकोमैट्रिक टेस्ट के साथ-साथ एसक्यू यानी स्पिरिच्युअलिटी कोशंट टेस्ट भी आ गया है। अब दुनिया को अपनी भावनाओं की नजर से देखते हैं। भावनाएं होना अच्छी बात है, लेकिन उसका प्रबंध करना ज्यादा जरूरी है।
6. समय प्रबंधन
छठी बात है- टी यानी टाइम। समय प्रबंधन। आज भारत में औसतन साढ़े पांच घंटे सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। मंदिर जाने का उनके पास वक्त नहीं है। समय निकलता नहीं है, समय निकालना पड़ता है। कभी वो आपके सामने आकर नहीं कहेगा कि मैं समय हूं, मुझे किसी अच्छी जगह इस्तेमाल कर लो। हम कहते हैं कि श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए तो लोग कहते हैं कि समय नहीं है। अगर आपकी प्राथमिकताएं तय नहीं हैं तो आप गलत चीजों में समय लगाते हैं। अगर भटकाव है तो समय बर्बाद होता रहेगा। हम आठ सेकंड से ज्यादा किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। इतना भटकाव हमारे जीवन में है। कोई चीज शुरू या खत्म करनी आसान होती है, उसे बनाए रखना मुश्किल होता है।