अल्जाइमर्स के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर है। इस लाइलाज बीमारी से बचाने के लिए जल्द ही एक दवा ईजाद होने वाली है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस) की एक टीम इस पर शोध कार्य कर रही है। सैद्धांतिक शोध पूरा भी हो गया है।
जून, 2016 में न्यूयार्क की मॉलीक्यूलर मेडिसिन जर्नल में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है। आईएमएस के जीव रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. डी दास के मार्गदर्शन में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. परेश कुलकर्णी ने यह शोध किया है।
डॉ. कुलकर्णी के मुताबिक दिमाग में पाया जाने वाला अम्लॉएड बीटा नामक प्रोटीन जब मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़ता है, तब वह न्यूरॉन कोशिकाओं को मारने लगता है। ऐसी स्थितियों में जब व्यक्ति को कहीं चोट लगती है तो अम्लॉएड बीटा बहुत तेजी से सक्रिय होता है। यह प्लेटलेट्स के जरिए मस्तिष्क की न्यूरॉन कोशिका तक पहुंचता है।
शोध में पाया गया कि चोट में ब्लीडिंग रोकने के लिए खून का थक्का बनना जरूरी होता है। इसमें प्लेटलेट्स की भूमिका अहम होती है और क्लॉटिंग का काम फिब्रोनीजेन नामक ग्लाइकोप्रोटीन करता है। फिब्रोनीजेन, अम्लॉएड बीटा को प्लेटलेट्स में जाने से रोकता है।
डॉ. कुलकर्णी कहते हैं कि अब हम फिब्रोनीजेन से ही ऐसा पेप्टाइड (अमीनो एसिड से बना सप्लीमेंट) बनाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे अल्जाइमर्स के लिए दवा बनाई जा सके। उन्होंने बताया कि अल्जाइमर्स का कोई इलाज नहीं है, लेकिन शुरुआत में ही इलाज शुरू कर दिया जाए तो इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि अल्जाइमर्स में मस्तिष्क के कोशिकाओं का नेटवर्क क्षतिग्रस्त हो जाता है और याददाश्त कमजोर होने लगती है।