अक्षय तृतीया, भगवान परशुराम जन्मोत्सव और ईद का त्योहार मंगलवार को पूरे देश में एक साथ मनाया जा रहा है। हिंदू और मुसलमान सहित हर समुदाय के लोग इस खुशी में शामिल हैं और एक-दूसरे को शुभकामना संदेश दे रहे हैं। रामनवमी और हनुमान जन्मोत्सव पर निकली शोभायात्राओं पर हुए पथराव के बाद समाज में जो कड़वाहट का माहौल पैदा हो गया था, वह आज दूर होता महसूस हो रहा है। सोशल मीडिया पर दिख रहे संदेश भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि वह कड़वाहट का दौर कमजोर पड़ रहा है। आज दिल्ली-एनसीआर में बादल छाए हुए हैं और तापमान सामान्य से कम है। शायद प्रकृति भी दोनों समुदायों में बेहतर रिश्ते देख इस रूप में अपनी खुशी का इजहार कर रही है।
फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना डॉ. मुफ्ती मुकर्रम अहमद ने अमर उजाला से कहा कि साझी संस्कृति ही हमारी पहचान रही है। इतिहास के लंबे कालखंड में बीच-बीच में कभी-कभी हिंदू-मुसलमान समुदाय के बीच तनाव का माहौल जरूर बना, लेकिन चंद दिनों के बाद ही दोनों समुदाय आपस में एक-दूसरे के साथ आ गए। हर बार ऐसा होता है तो केवल इसलिए क्योंकि शांतिपूर्ण सहअस्तित्व ही हमारी संस्कृति का आधार है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग त्योहार अलग-अलग धर्मों के साथ जोड़े जाते हैं। लेकिन यह गलत है। असलियत यह है कि हमारे हर त्योहार पूरे देश, पूरे समाज के हैं। जाने-अनजाने हर त्योहार के साथ हर समुदाय के लोग जुड़ जाते हैं। ईद हो या होली-दिवाली, महावीर जयंती हो या क्रिसमस, हर त्योहार पर पूरे समाज के लोग आपस में जुड़ जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलग-अलग धार्मिक पहचान के बाद भी हमारी सांस्कृतिक जड़ें इस मिट्टी से जुड़ी हुई हैं, जिसने हम सब पर एक जैसा प्यार लुटाया है।
अहमदिया मुस्लिम जमात की नींव 1889 में रखी गई थी। इसके संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने अपनी मृत्यु से पहले 1908 में ‘पैगाम-ए-सुला’ (अमन का संदेश) नाम की एक पुस्तक लिखी थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में साफ संदेश दिया है कि मुसलमानों को हर धर्म के लोगों, उनके आराध्य धार्मिक पुरूषों और उनकी धार्मिक किताबों का सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने कहा है कि समाज में शांतिपूर्ण माहौल तभी हो सकता है जब समाज के हर धर्म के लोग एक दूसरे के धर्म, उनकी आस्थाओं का सम्मान करें। यदि लोग एक दूसरे की आस्थाओं का सम्मान नहीं करते तो देश का आगे बढ़ना मुश्किल होगा और इससे पूरे देश-समाज का नुकसान होगा।
तारिक अहमद (प्रवक्ता, अहमदिया मुस्लिम जमात) ने कहा कि यह देखकर बेहद खुशी का अनुभव हो रहा है कि आज हिंदू-मुस्लिम सभी अपने मतभेद भुलाकर एक बार फिर साथ आ गए हैं। लोग एक दूसरे से ईद की खुशी साझा कर रहे हैं, तो भगवान परशुराम जन्मोत्सव की बधाई भी दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि दोनों समुदाय और पूरा देश इसी तरह एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़ा रहे। इसी से देश की तरक्की का रास्ता निकलता है।
पद्म पुरस्कार विजेता मोहम्मद हनीफ शास्त्री ने एक मुस्लिम होते हुए भी 1994 में ‘गायत्री मंत्र’ पर शोध किया था। अपने गहन शोध के बाद उन्होंने पाया था कि गायत्री मंत्र और अल हंद शरीफ में अद्भुत समानता है। अल हंद शरीफ नमाज के समय पढ़ी जाती है और माना जाता है कि इससे पढ़े बिना नमाज कभी पूरी नहीं होती। हनीफ शास्त्री ने दोनों में बहुत ज्यादा समानता पाई थी और कहा था कि शब्दों के अंतर होने के बाद भी दोनों एक ही ईश्वर को पाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मोहम्मद हनीफ शास्त्री के भतीजे मोहम्मद इशहाम खान ने अमर उजाला से कहा कि ईद के दिन पर ही अक्षय तृतीया और भगवान परशुराम जन्मोत्सव का पड़ना एक तरह से परमात्मा का संदेश है कि वह दोनों ही समुदायों को एक साथ हंसते-खेलते, आपस में खुशी और प्यार बांटते हुए देखना चाहता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर के इस संदेश को हमें समझना चाहिए और समाज में भाईचारे की भावना को आगे बढ़ाना चाहिए।
एक साहित्यकार के रूप में अपनी लेखनी से देश के साहित्य को समृद्ध कर रहे मोहम्मद इशहाम खान ने कहा कि बड़े संयुक्त परिवार में कभी-कभी बच्चे आपस में झगड़ पड़ते हैं, लेकिन उनके अभिभावकों की समझदारी, अपनत्व और प्यार भरी दखल के बाद बच्चों का तनाव पल भर में दूर हो जाता है और वे फिर प्यार से एक दूसरे के साथ खेलने लगते हैं।