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एयरफोर्स ने 126 एयरक्राफ्ट मांगे थे, लेकिन मोदी सरकार ने इनकी संख्या को 36 कर दी: चिदंबरम   

Sat, 19 Jan 2019 01:46 PM IST
टीम डिजिटल डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पी चिदंबरम
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कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने राफेल डील को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है। शुक्रवार को एक प्रेसवार्ता में उन्होंने आरोप लगाया कि एयरफोर्स ने अपनी जरुरतों के मद्देनजर 126 एयरक्राफ्ट मांगे थे, लेकिन सरकार ने उनकी इस मांग को घटाकर 36 कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री, वित्तमंत्री और कानून मंत्री ने कभी इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि सरकार ने सात स्क्वाड्रन की जगह केवल दो स्क्रवाड्रन एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना को मंजूरी क्यों दी है।

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चिदंबरम का कहना था कि राफेल की कीमतों को लेकर जब भी मोदी सरकार से सवाल पूछा जाता है तो उनका जवाब यह होता है कि भारत और फ्रांस के बीच जो करार हुआ है उसकी गोपनीयता की शर्तों के कारण कीमत नहीं बता सकते। दूसरी ओर, राफेल डील में यह भी लिखा है कि गोपनीयता की शर्तें रक्षा से संबंधित बातों तक ही सीमित हैं। इसका साफ मतलब है कि राफेल की कीमत सार्वजनिक की जा सकती है।

यूपीए सरकार ने 2007 में दसॉल्ट एविएशन के साथ बातचीत कर राफेल विमान की राशि 79.3 मिलियन यूरो (642 करोड़ रुपये) तय की थी। साल 2011 में यह कीमत 100.85 मिलियन यूरो (817 करोड़ रुपये) हो गई। एनडीए सरकार ने 2016 में दावा किया कि उसने राफेल की 2011 वाली कीमतों के अनुसार नौ फीसदी की छूट ले ली है। खास बात है कि यह छूट 126 विमानों के लिए नहीं, बल्कि 36 विमानों के लिए मिली थी। अब एक विमान की कीमत 91.75 मिलियन यूरो (743 करोड़ रुपये) तय कर दी गई।
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पी. चिदंबरम ने कहा, भारतीय वायु सेना ने यह मांग रखी थी कि राफेल विमान कम से कम 13 विशेषताओं से लैस होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो ही एयरफोर्स की जरुरत पूरी हो सकती है। इन बातों पर विचार करने के बाद तय हुआ कि 36 राफेल विमानों के लिए 1.3 बिलियन यूरो (10536 करोड़ रुपये) अदा किए जाएंगे।

इस हिसाब से प्रति विमान की कीमत 36.11 मिलियन यूरो (292 करोड़ रुपये) बनती है। 2007 में इसकी कीमत 11.11 मिलियन यूरो (90 करोड़ रुपये) थी। यहां बता दें कि वायु सेना ने जिन 13 विशेषताओं की मांग रखी थी, वे यूपीए और एनडीए सरकार के समय में वैसी ही थी। उनमें कोई बदलाव नहीं आया था।

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हर बार 4-3 से ही फैसला क्यों किया गया

Rafale Deal
राफेल विमान सौदे के लिए सात सदस्यों की इंडियन नेगोशिएशन टीम बनी थी। इस टीम के तीन सदस्य ऐसे थे, जिन्होंने राफेल की कीमत ही नहीं, बल्कि दूसरी तकनीकी बातों पर भी एतराज जताया था। यहां पर खास बात यह है कि जब भी राफेल खरीद को लेकर कोई बैठक होती, हर बार सात में से चार सदस्य अपने तीन साथियों द्वारा उठाए गए सवालों को खारिज कर देते। मोदी सरकार बताए कि हर बार 4-3 के अंतर से ही फैसला क्यों होता रहा।

तीन सदस्यों का कहना था कि भारत की जरूरतों के मुताबिक राफेल तैयार करने के लिए अलग से 1.3 बिलियन यूरो (10536 करोड़ रुपये) की रकम चाहिए। उन्होंने कहा, यह राशि बहुत ज्यादा है। टीम ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए लिखा कि 126 विमानों को तैयार करने के लिए 1.4 बिलियन यूरो (11345 करोड़ रुपये) दिया जाना था, उससे कहीं बेहतर है 36 विमानों के लिए 1.3 बिलियन यूरो (10536 करोड़ रुपये) देना। पीएम के नेतृत्व में रक्षा मामलों की मंत्रिमंडल की समिति ने टीम के फैसले पर मुहर लगा दी। तीनों सदस्यों ने अपना मत ना में दिया था।

इस रिपोर्ट की समीक्षा कानून मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति करती है। सरकार के नोट में रक्षा मंत्री मनोहन पर्रिकर की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) का कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। कांग्रेसी नेता ने कहा, यह कैसे हो सकता है।

रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत डीएसी को ही यह फैसला लेने का अधिकार है। 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी जब पेरिस में अपनी तरफ से डील का एलान कर रहे थे तो रक्षा मंत्री खुद को अनजान बता रहे थे। जब यूरो फाइटर 20 प्रतिशत कम दाम पर उसी क्षमता का जहाज दे रहा था तब 41.42 प्रतिशत अधिक दाम पर राफेल क्यों खरीदा गया। यूरोफाइटर ने यह भी कहा था कि हमारी कंपनी भारत में यूरोफाइटर इंडस्ट्रीयल पार्क बनाएगी।

ट्रेनिंग भी देगी। अन्य किसी मदद की जरूरत पड़ेगी तो वह भी देंगे। अब नई डील में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स को भी बाहर कर दिया गया, जिसे पहले 108 जहाज बनाने थे। इस मामले की जांच जेपीसी से होती है तो ही सच सामने आ सकेगा।
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