राफेल विमान सौदे के लिए सात सदस्यों की इंडियन नेगोशिएशन टीम बनी थी। इस टीम के तीन सदस्य ऐसे थे, जिन्होंने राफेल की कीमत ही नहीं, बल्कि दूसरी तकनीकी बातों पर भी एतराज जताया था। यहां पर खास बात यह है कि जब भी राफेल खरीद को लेकर कोई बैठक होती, हर बार सात में से चार सदस्य अपने तीन साथियों द्वारा उठाए गए सवालों को खारिज कर देते। मोदी सरकार बताए कि हर बार 4-3 के अंतर से ही फैसला क्यों होता रहा।
तीन सदस्यों का कहना था कि भारत की जरूरतों के मुताबिक राफेल तैयार करने के लिए अलग से 1.3 बिलियन यूरो (10536 करोड़ रुपये) की रकम चाहिए। उन्होंने कहा, यह राशि बहुत ज्यादा है। टीम ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए लिखा कि 126 विमानों को तैयार करने के लिए 1.4 बिलियन यूरो (11345 करोड़ रुपये) दिया जाना था, उससे कहीं बेहतर है 36 विमानों के लिए 1.3 बिलियन यूरो (10536 करोड़ रुपये) देना। पीएम के नेतृत्व में रक्षा मामलों की मंत्रिमंडल की समिति ने टीम के फैसले पर मुहर लगा दी। तीनों सदस्यों ने अपना मत ना में दिया था।
इस रिपोर्ट की समीक्षा कानून मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति करती है। सरकार के नोट में रक्षा मंत्री मनोहन पर्रिकर की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) का कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। कांग्रेसी नेता ने कहा, यह कैसे हो सकता है।
रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत डीएसी को ही यह फैसला लेने का अधिकार है। 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी जब पेरिस में अपनी तरफ से डील का एलान कर रहे थे तो रक्षा मंत्री खुद को अनजान बता रहे थे। जब यूरो फाइटर 20 प्रतिशत कम दाम पर उसी क्षमता का जहाज दे रहा था तब 41.42 प्रतिशत अधिक दाम पर राफेल क्यों खरीदा गया। यूरोफाइटर ने यह भी कहा था कि हमारी कंपनी भारत में यूरोफाइटर इंडस्ट्रीयल पार्क बनाएगी।
ट्रेनिंग भी देगी। अन्य किसी मदद की जरूरत पड़ेगी तो वह भी देंगे। अब नई डील में हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स को भी बाहर कर दिया गया, जिसे पहले 108 जहाज बनाने थे। इस मामले की जांच जेपीसी से होती है तो ही सच सामने आ सकेगा।