कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर के हाव-भाव चिर-परिचित मुद्रा से अलग थे। भाजपा सांसद और सहयोगी दल भी किसानों के आंदोलन को लेकर आपस में एकमत नहीं हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि किसानों के आंदोलन के लिए राष्ट्रद्रोही, खालिस्तानी जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
कई सांसदों का मानना है कि किसान आंदोलन ने विपक्ष के नेताओं को एकजुट होने का अवसर दे दिया है। भाजपा के सहयोगी दल के एक नेता का कहना है कि मुद्दे का जल्द से जल्द और तर्कसंगत समाधान होना चाहिए। माना जा रहा है कि किसान आंदोलन से पैदा हुई स्थिति का असर शुक्रवार कृषि मंत्री के हाव भाव पर भी साफ देखा गया।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के साथ-साथ किसान आंदोलन पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि तीन कृषि कानूनों का मुद्दा ज्वलंत है। मैं विपक्ष के सदस्यों को इसके लिए धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने सरकार को कोसने में कोई कंजूसी नहीं की।
तीनों कृषि कानूनों को भी काला कानून कहा। कृषि मंत्री ने काला कानून शब्द पर जोर दिया। उनके इस इस्तेमाल पर विपक्ष में बैठे सदन के नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद अपनी हंसी नहीं रोक सके। कृषि मंत्री ने कहा कि उन्होंने किसान नेताओं से भी पूछा कि इस कानून में काला क्या है? ताकि वह इसको ठीक करने का प्रयास करें।
कृषि मंत्री ने कहा कि उन्होंने सबकी बात सुनी, लेकिन इसे किसी ने नहीं बताया। उन्होंने कहा कि तीनों कृषि कानूनों को लेकर देश में उल्टी गंगा बह रही है। राज्य सरकार के कानून टैक्स देने पर बाध्य करते हैं और केंद्र का कानून टैक्स को खत्म करता है, लेकिन आंदोलन राज्यों के बजाय केंद्रीय कानून के खिलाफ हो रहा है। केंद्रीय मंत्री ने पंजाब सरकार के कानून की खामियां भी गिनाईं। कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग पर भी बोले और कहा कि केंद्र सरकार पूरी तरह से किसानों के प्रति समर्पित है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने 12 बार किसानों के साथ बैठकें कीं, सम्मान दिया और कानून में कमियां बताकर संशोधन सुझाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि उचित संशोधन के लिए तैयार हैं। कृषि मंत्री ने कहा कि उन्होंने किसानों के खिलाफ इधर-उधर नहीं बोला, संवेदनशीलता के साथ विचार किया है। लेकिन हमने ये जरूर कहा है कि आप प्रावधान में कहां गलती है, हमारा ध्यान आकर्षित कीजिए। उनको प्रस्ताव देने का भी प्रयत्न किया।
लेकिन मैंने साथ में यह भी कहा कि अगर भारत सरकार किसी भी संशोधन के लिए तैयार है, तो इसके मायने यह नहीं लगाना चाहिए कि किसान कानून में कोई गलती है। इसके बावजूद किसान आंदोलन पर हैं। पूरे एक राज्य में लोग गलतफहमी का शिकार हैं। कृषि मंत्री ने कहा कि किसानों को इस बात के लिए बरगलाया गया है कि ये कानून (कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के प्रावधान) आपकी जमीन को ले जाएंगे।
आनंद शर्मा अनुभवी नेता हैं। आज उन्होंने विपक्ष की भूमिका को लेकर सरकार को उसकी मर्यादा याद दिलाई। तीनों कृषि कानूनों के विरोध और किसान आंदोलन के समर्थन में बोलते हुए आनंद शर्मा ने कहा कि इस स्थिति के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है।
कोविड-19 संक्रमण और लॉकडाउन काल में इस कानून को लाने की जरूरत पर भी उन्होंने सवाल उठाया और कहा कि यह जरूरी नहीं है कि जो सरकार बोले उसे जनता मान ही ले या विपक्ष सरकार के साथ खड़ा रहे। यह न तो अनिवार्य है और न ही स्वीकार्य। शर्मा ने कहा कि जनता की आवाज को सुनना सरकार का दायित्व है, लेकिन विरोध प्रदर्शन को आप अपराध करार दे रहे हैं?
उन्होंने कहा कि जब किसान पर अत्याचार होगा या होता है तो उसके साथ देश खड़ा होगा और इसे सरकार को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसान इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं और इसे आप (सरकार) वापस लीजिए।