अग्निपथ योजना पर अग्निवीरों की चार साल की सेवा के बाद उन्हें अन्य नौकरियों में समाहित करने को लेकर केंद्र ने अभी तक कोई विस्तृत योजना का खुलासा नहीं किया है, वहीं, विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने योजना के अनुकूल कोई घोषणा नहीं की है। वहीं, कई विपक्षी राज्यों ने योजना का विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।
14 जून को ‘अग्निपथ’ योजना की घोषणा के बाद, कम से कम 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों- बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, हरियाणा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और दिल्ली में विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें से कुछ हिंसक थे।
जबकि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, असम और गृह मंत्रालय (एमएचए) ने घोषणा की कि वे पुलिस की भर्ती में अग्निवीर को वरीयता देंगे, गृह मंत्रालय (एमएचए) ने कहा कि उसने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) और असम राइफल्स में अग्निवीर के लिए 10 प्रतिशत रिक्तियों को आरक्षित करने का निर्णय लिया है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होगी। राज्य पुलिस भर्ती बोर्ड के एक प्रमुख ने कहा कि रोजगार में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है और अधिकांश अग्निवीर अनारक्षित श्रेणी में होंगे क्योंकि सेना में कोई आरक्षण प्रणाली नहीं है। ऐसे में यह विचार कि उन्हें सीएपीएफ में समाहित किया जा सकता है, राज्य पुलिस काम नहीं कर सकती है। उन्हें केवल 50 प्रतिशत अनारक्षित रिक्तियों के खिलाफ विचार करना होगा। इसका मतलब यह भी होगा कि मेधावी और बेहतर शिक्षित गैर-अग्निवीरों के लिए पुलिस में शामिल होने के लिए यह मुश्किल होगा, यह पुलिस की दक्षता को प्रभावित करेगा।
जांच के दायरे में आ सकती है पूरी प्रक्रिया: विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पूरी प्रक्रिया कानूनी जांच के दायरे में आ सकती है क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि सशस्त्र बलों में चार साल के कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त अग्निवीर के वेतन की रक्षा की जाएगी और वरिष्ठता को बनाए रखा जाएगा। एक विशेषज्ञ ने कहा, सरकार के लिए यह एक कड़ा कदम होगा क्योंकि राज्य पुलिस द्वारा सीधे भर्ती किए गए कांस्टेबलों के बीच किसी भी तरह के असंतोष से बचने के लिए इस पर स्पष्टता बरतनी होगी।