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उत्तराखंड संकट: हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

Fri, 22 Apr 2016 05:54 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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Supreme Court hearing on Saturday - फोटो : Getty Images
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हाईकोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल तक रोक लगा दी है। इस फैसले के साथ ही उत्तराखंड में एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
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इस मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने दोनों दलों का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के आदेश जारी कर दिए। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद हरीश रावत ने अपना पद भार संभाल लिया और कई अहम फैसले भी कर दिए जो कि असंवैधानिक है। केंद्र सरकार की ओर से दलील देते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के फैसले की अब तक कोई लिखित कॉपी बाहर नहीं आई है। ऐसे में केवल मौखिक आदेश की दम पर कोई भी राज्य की सत्ता नहीं संभाल सकता। FLASH: SC stays #Uttarakhand HC order lifting President's rule in the state till April 27 — ANI (@ANI_news) April 22, 2016 हालांकि, राज्य सरकार की ओर से दलील दे रहे वकील अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाने के लिए जोर देते रहे।
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दोनों पक्षों की दलील सुनने के बार कोर्ट ने यह कहते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक दी कि हाईकोर्ट तुरंत अपने आदेश की लिखित कॉपी मुहैया कराए। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी निर्देश दिए कि वह 27 अप्रैल तक राष्ट्रपति शासन के दौरान सरकार बनाने की कोशिश न करे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एजी मुकुल रोहतगी ने बताया कि  सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को भी यह निर्देश दिए हैं कि वह आगामी 27 अप्रैल तक राज्य में सरकार बनाने की कोशिश न करे। कोर्ट के इस आदेश के बाद हरीश रावत अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नहीं रह गए। उत्तराखंड की सत्ता एक बार फिर से राज्यपाल के हाथ में चला गया। Court has added a rider that the Govt will not revoke President's rule before April 27: Mukul Rohatgi, AG pic.twitter.com/ogRdJOfA3L — ANI (@ANI_news) April 22, 2016

हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के 10 बड़े सवाल

नैनीताल हाईकोर्ट ने हटा दिया राष्ट्रपति शासन - फोटो : PTI
नैनीताल हाईकोर्ट का आदेश सही नहीं है और उसे राष्ट्रपति शासन पर सुनवाई का अधिकार नहीं है जोकि मंत्रिमंडल की सलाह और तथ्यों पर लिया गया। हाईकोर्ट कहता है कि भ्रष्टाचार सहा नहीं जाएगा, लेकिन उसने यह आदेश जारी कर याचिकाकर्ता को राहत दी जिस पर स्टिंग ऑपरेशन में हार्स ट्रेडिंग और घूस के आरोप लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई जजमेंट के आधार पर हाईकोर्ट के पास राष्ट्रपति शासन पर सुनवाई के लिए सीमित अधिकार हैं, हाईकोर्ट ने इस मामले में अपने अधिकार से बाहर आदेश दिया है, वह राष्ट्रपति के संतुष्ट होने पर फैसला नहीं कर सकता। हाईकोर्ट मंत्रीमंडल की राष्ट्रपति शासन लगाने की सलाह की सत्यतता और वैद्यता पर सुनवाई नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल को आदेश सुनाया लेकिन लिखित आदेश नहीं दिया। हाईकोर्ट ने यह फैसला हरीश रावत के गलत और छुपाए हुए तथ्यों के आधार पर दिया है, जो गलत है। हाईकोर्ट का यह कहना भी गलत है कि बजट बिल पास नहीं होने पर सरकार नहीं गिरती बल्कि सरकार को इस्तीफा देना होता है। कानून के मुताबिक, बजट बिल के फेल होते ही सरकार गिर जाती है। हाईकोर्ट ने विधायको की खरीद फरोख्त की स्टिंग पर गौर नहीं किया जबकि यह एक बड़ा आधार है। AG ने कोर्ट में कहा है कि आदेश की कॉपी नहीं होने से अपंग हो गए हैं। ऑर्डर की कॉपी आने के बाद सुनवाई की जाए। हाईकोर्ट की कॉपी मिलने तक आदेश पर रोक लगाई जाए।

किसने क्या कहा?

हरीश रावत को 27 अप्रैल का इंतजार - फोटो : ANI
शुक्रवार की शाम साढ़े तीन बजे जब सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश पर सुनवाई शुरू हुई तो सबसे पहले न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने दोनों पक्षों की दलील सुनी। इस दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटाने के जो आदेश जारी किए हैं उसकी अब तक लिखित कॉपी नहीं मिली है। जिसकी वजह से हरीश रावत राज्य के मुख्यमंत्री पद का कार्यभार नहीं संभाल सकते। हाई कोर्ट ने अब तक केवल मौखिक आदेश ही दिए हैं ऐसे में हरीश रावत कैसे कैबिनेट की बैठक कर सकते हैं। इतना ही नहीं रावत ने कई अहम फैसले भी कर लिए। इस आधार पर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाना चाहिए।

वहीं राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए वकील अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का विरोध किया। उन्होंने अपनी दलील देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने के बजाय इस पर सुनवाई जारी रहनी चाहिए। लेकिन कोर्ट ने उनके इस दलील को आधारहीन मानते हुए बिना किसी लिखित आदेश के राष्ट्रपति शासन को हटाए जाने के फैसले पर 27 अप्रैल को होने वाली सुनवाई तक रोक लगा दिया। साथ ही उस दिन हाईकोर्ट के लिखित आदेश की कॉपी भी पेश करने को कहा। SC directs Uttarakhand HC to provide the judgement to all parties by April 26 and same be filed before this court on that day — ANI (@ANI_news) April 22, 2016
कोर्ट से बाहर आने के बाद एजी मुकुल रोहतगी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री नहीं रहे। राज्य में फिर से राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और अगले आदेश तक सत्ता राज्यपाल के हाथ में चली गई है। This means that Governor's rule revives and CM will have no power or jurisdiction to work any further till further orders: Mukul Rohatgi, AG — ANI (@ANI_news) April 22, 2016
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कैलाश विजयवर्गीय ने भी अपनी सहमति जताते हुए कहा कि हरीश रावत ने राज्यपाल के अनुमति के बगैर ही राज्य का कार्यभार संभाल लिया था। Harish Rawat took the CM office yesterday without permission of Governor: Kailash Vijayvargiya, BJP #Uttarakhand pic.twitter.com/m9OmeUvHzh — ANI (@ANI_news) April 22, 2016
वहीं हरीश रावत ने इस फैसले को अंतरिम आदेश बताते हुए 27 अप्रैल को हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी आ जाने तक इंतजार करने की बात कही। This order is interim, till 27th, because SC didn't have HC's judgement copy: Harish Rawat #Uttarakhand pic.twitter.com/FFNYB2Mv55 — ANI (@ANI_news) April 22, 2016
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राष्ट्रपति शासन हटाने का दिया था आदेश

नैनीताल हाईकोर्ट ने हटा दिया राष्ट्रपति शासन - फोटो : PTI
राज्य में लगे राष्ट्रपति शासन पर नैनीताल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को करारा झटका देते हुए उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को हटा दिया था। कोर्ट ने 27 मार्च की रात को राष्ट्रपति शासन लगाए जाने से पूर्व की स्थिति को बहाल करते हुए विधानसभा में शक्ति परीक्षण के लिए 29 अप्रैल की तारीख भी तय कर दी थी। बृहस्पतिवार को आए हाईकोर्ट के इस निर्णय से तीन बातें सामने आई। पहली हरीश रावत सीएम बहाल हो गए हैं, दूसरी उन्हें 29 अप्रैल को सदन में बहुमत साबित कहना है और तीसरी बागी विधायकों को निष्कासित करने के मामले में 23 अप्रैल को एकल पीठ के समक्ष सुनवाई होनी है। इसी के बाद तय होगा कि वे मतदान में भाग ले पाएंगे या नहीं। केंद्र सरकार की ओर से पैरवी कर रहे राकेश थपलियाल ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।

हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को अपना अहम फैसला देते हुए लगभग 28 दिनों से अलग अलग मुद्दों को लेकर हो रही बहस के बाद अपना फैसला सुनाया। फैसले की मुख्य बात यह थी कि इसके अनुसार कोर्ट ने 26 मार्च की स्थिति को बहाल कर दिया, जिसके अनुसार तब हरीश रावत मुख्यमंत्री थे उन्हें फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करना था और बागी विधायक स्पीकर के द्वारा निलंबित थे। अत: इस निर्णय के अनुसार पुन: वहीं स्थितियां बन गई हैं। मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले  की सुनवाई हुई। उत्तराखंड में धारा 356 का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को हरीश रावत ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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