केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के बीच हुई मुलाकात के बाद इस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर का बंटवारा किया जाएगा। जम्मू को अलग से पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मुहिम शुरू हो सकती है। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के मुताबिक जिस भी बटालियन से जवानों को चुनावी ड्यूटी पर भेजा गया था, अब वे वापस आ रहे हैं। सुरक्षा बलों के अधिकारियों से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने भी कुछ ऐसा ही जवाब दे दिया। कहा, जम्मू में जवानों का क्वारंटीन चल रहा है। एक साथ सैंकड़ों गाड़ियों नजर आ रही हैं। घाटी के ये दृश्य देखकर पाकिस्तान भी हिल गया है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हाफिज चौधरी ने बयान देने में जरा सी देर नहीं लगाई। उन्होंने कह दिया कि इस तरह के बदलाव का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होगा। भारत ने जम्मू-कश्मीर में एकपक्षीय और अवैध कार्रवाई कर अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी पीएम इमरान खान भी घाटी की खबरों से परेशान हो उठे हैं। उन्होंने भी कह दिया, भारत अगर अनुच्छेद 370 की बहाली का रोडमैप दे तो दोनों देशों के बीच दोबारा से बातचीत संभव हो सकती है।
भाजपा प्रवक्ता बताते हैं, ये केवल अटकलें हैं। इन्हें वे लोग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनके पास अब राजनीतिक दायरा नहीं बचा है। जम्मू-कश्मीर का विभाजन न तो राष्ट्रहित में है और न ही स्थानीय लोगों के। केंद्र सरकार ऐसा कदम क्यों उठाएगी, जो किसी के हित में नहीं है। जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस मिलने में अगर चार-पांच साल भी लगें तो क्या दिक्कत है। अब पहले से ज्यादा विकास हो रहा है, ज्यादा बजट मिल रहा है। कोई ये बताए कि कमी कहां पर है। किसी को गद्दी चाहिए तो वह हमारे वश में नहीं है।
सज्जाद लोन हो, महबूबा हो या अब्दुल्ला परिवार, इनकी राजनीति अब खत्म हो गई है। कोई मुद्दा भी नहीं बचा है। ये नेता किसी न किसी तरह के केस में उलझे हैं। अब इन्हें एक ही बात नजर आती है कि किसी भी तरह से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर कश्मीर का मुद्दा उछालते रहो। इन नेताओं का सीमा पार का लगाव जग जाहिर है। सुरक्षा बलों की दो सौ से ज्यादा कंपनियों को चुनावी ड्यूटी पर भेजा गया था। 2019 में जब अनुच्छेद 370 समाप्ति की घोषणा हुई तो केंद्रीय सुरक्षा बलों की करीब साढ़े चार सौ कंपनियों को घाटी में तैनात किया गया था।
जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) का कहना है, सरकार को यहां जल्द विधानसभा चुनाव कराने चाहिए। जो भी सीटें बढ़ानी या घटानी हैं, वह काम जल्द पूरा कर लिया जाए। कश्मीर के टुकड़े करना, किसी भी तरह से जायज नहीं है। इसका कोई फायदा नहीं होगा। अनुच्छेद 370 हटाने के बाद कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। भारत के लिए अब इस तरह की कोई पहल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठीक नहीं कही जाएगी। भले ही राजनीतिक तौर पर पीओके की चर्चा कर ली जाए, लेकिन वास्तव में वह हकीकत से कोसो दूर है। आज 1971 वाली स्थितियां नहीं हैं। पाकिस्तान के लिए चीन बोलेगा ही नहीं, बल्कि करेगा भी। इसकी वजह, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या सीपीईसी है। इसे चीन का महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट कहा जाता है। यह कॉरिडोर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन जैसे विवादित इलाको से होकर गुजरता है। भारत इस प्रोजेक्ट का विरोध करता है क्योंकि यह पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है। सीपीईसी को बनाने में चीन भारी निवेश कर रहा है। अब चीन का इस प्रोजेक्ट से हाथ पीछे खींचना संभव नहीं है।