सूत्रों का कहना है कि सीआरपीएफ को छह सौ मीटर दूरी तक सटीक निशाना लगाने वाली स्नाइपर राइफलें मुहैया कराई जाएंगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं, नक्सलियों के पूर्ण खात्मे के लिए जवानों को जो भी उपकरण/संसाधन चाहिएं, वे तुरंत उपलब्ध कराए जाएं। इसके साथ ही जम्मू कश्मीर में भी आतंकियों का मुकाबला करने के लिए सीआरपीएफ दस्ते को स्नाइपर राइफलें उपलब्ध कराई जा सकती हैं। माओवाद से प्रभावित क्षेत्रों में पहले एक बटालियन की संख्या में नक्सली हमला करते थे। सुरक्षा बलों ने जब नक्सलियों पर प्रहार किया तो वे कंपनी तक सिमटते चले गए। वजह, सुरक्षा बलों ने घने जंगल में नक्सलियों के गढ़ में कैंप स्थापित कर दिए। वहां से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया।
अब नक्सली, बड़े समूह में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। वे महज एक छोटे समूह या टोली तक सिमट गए हैं। उसमें भी नक्सली, स्नाइपर राइफलों की मदद ले रहे हैं। आईईडी विस्फोट के नए तरीके इस्तेमाल में ला रहे हैं। कई वर्षों से नक्सली स्वदेशी प्रोपेलर और मोर्टार तैयार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़, तेलंगाना, बिहार, ओडिशा व झारखंड आदि राज्यों में ट्राई-जंक्शन पर नक्सलियों द्वारा, स्नाइपर राइफलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी कह चुके हैं, नक्सलियों के सामने गोला-बारूद का संकट है। नई भर्ती नहीं हो पा रही है। इस स्थिति में नक्सली, स्नाइपर्स और बूबी ट्रैप की तरफ अग्रसर हैं। वे कम संख्या और संसाधनों में सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। इसी के चलते अब सीआरपीएफ व दूसरे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को उनकी रणनीति के तहत ही माकूल जवाब देने की तैयारी की है।
स्नाइपर राइफल के अलावा सुरक्षा बलों को अब बख्तरबंद प्लेटफॉर्म वाले वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। पहले सुरक्षा बलों के पास बारूदी सुरंग रोधी वाहन होते थे, लेकिन नक्सली, एमपीवी के नीचे भारी मारक क्षमता वाली आईईडी लगाकर उन्हें उड़ा देते थे। अब बख्तरबंद गाड़ी, 100 किलोग्राम वजनी आईईडी के विस्फोट के प्रभाव को झेल सकती है। इस वाहन में दर्जनभर सुरक्षा कर्मी सवार होते हैं। अगर 50 किलोग्राम की आईईडी लगी है तो यह वाहन उसके विस्फोट के प्रभाव को भी झेल सकता है। अगर इसके टायर में गोली लगती है तो उसके बाद भी गाड़ी चालीस किलोमीटर तक चल सकती है। बड़ी क्षमता वाला विस्फोट है तो यह गाड़ी उछल सकती है, लेकिन उसमें जवानों के बचे रहने की उम्मीद बनी रहती है।
घने जंगल में नक्सलियों को टारगेट करने के लिए अब सुरक्षा बलों को थर्मल ड्रोन मुहैया कराने की योजना है। इनका ट्रायल हो चुका है। थर्मल कैमरों को थर्मोग्राफिक कैमरा या इंफ्रारेड कैमरा कहा जाता है। किसी भी वस्तु से निकलने वाले हीट रेडिएशन को देखने या डिटेक्ट करने के लिए इस ड्रोन का इस्तेमाल किया जाता है। थर्मल कैमरे, इंफ्रारेड स्पेक्ट्रम की थ्योरी पर काम करते हैं। थर्मल कैमरों के जरिए टेम्प्रेचर वैरिएंशंस नोट हो सकता है। इसे कोई भी इंसान अपनी आंखों से नहीं देख सकता। धुंध, अंधेरे, बरसात व आंधी-तूफान में किसी व्यक्ति की उपस्थिति को यह ड्रोन बता सकता है। ऐसे में जंगलों में छिपे नक्सली, सुरक्षा बलों के निशाने पर आ जाते हैं।
वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या में उत्तरोत्तर गिरावट आई है। लगातार बेहतर हो रही स्थिति को देखते हुए, पिछले छह वर्षों में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की तीन बार समीक्षा की गई है, जिसमें अप्रैल 2018 में 126 से घटकर 90 जिले, जुलाई 2021 में 70 और फिर अप्रैल 2024 में घटकर 38 रह गए हैं। 2010 के उच्च स्तर की तुलना में 2023 में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में 73% की कमी आई है। इसी अवधि के दौरान परिणामी मौतों (नागरिकों + सुरक्षा बलों) में भी 86% की कमी आई है। चालू वर्ष में (15.11.2024 तक), 2023 की इसी अवधि की तुलना में वामपंथी उग्रवादी हिंसा की घटनाओं में 25% की और कमी आई है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी व्यय योजना में 2004 से 2014 तक 1180 करोड़ रूपए खर्च हुए थे, जिसे मोदी सरकार ने लगभग 3 गुना बढ़ाकर बढ़ाकर 2014 से 2024 के बीच 3,006 करोड़ रूपए कर दिया है। एलडब्लूई के प्रबंधन के लिए केन्द्रीय एजेंसियों को सहायता योजना में 1055 करोड़ रूपए दिए गए। विशेष केन्द्रीय सहायता एक नई योजना है जिसके तहत मोदी सरकार ने पिछले 10 साल में 3590 करोड़ रूपए खर्च किए हैं। अब तक कुल 14367 करोड़ रूपए अनुमोदित किए गए हैं, जिसमें से 12000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
2004 से 2014 के बीच 10 साल में 66 फोर्टीफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए थे, जबकि 2014 से 2024 के मध्य के 10 साल में 544 बनाए गए हैं। 2014 से पहले के 10 साल में 2900 किलोमीटर सड़क नेटवर्क निर्माण हुआ था, जो पिछले 10 साल में बढ़कर 14,400 किलोमीटर हो गया है। 2014 से 2024 तक 6000 मोबाइल टावर लगा दिए गए हैं। इनमें से 3551 टावर को 4G बनाने का काम भी समाप्त हो गया है। 2014 से पहले मात्र 38 एकलव्य मॉडल स्वीकृत हुए थे, अब पिछले 10 साल में 216 स्कूल स्वीकृत हुए हैं। इनमें से 165 एकलव्य मॉडल स्कूल अस्तित्व में आ गए हैं।
2004 से 2014 के बीच 10 साल में 16463 हिंसा की घटनाएं हुई थी, जो लगभग 53% की कमी के साथ अब घटकर 7700 तक सीमित रह गई हैं। इसी प्रकार नागरिकों और सुरक्षाबलों की मृत्यु में 70% की कमी हुई है। हिंसा रिपोर्ट करने वाले 96 जिले, अब 57 प्रतिशत की कमी के साथ घटकर 16 रह गए हैं। हिंसा की सूचना देने वाले पुलिस स्टेशन भी 465 में से 171 रह गए हैं, जिनमें से 50 पुलिस स्टेशन नए बने हैं। सुरक्षा वैक्यूम को भरने के लिए 2019 से अब तक 280 से अधिक कैंप बनाए गए हैं। 15 नए जॉइंट टास्क फोर्स गठित हुए हैं।