सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में मंगलवार को अहम टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में युवक को बरी करते हुए कहा कि ठोस सबूत के बिना आरोपी को केवल आचरण के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अभियुक्त की अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय का निर्णय कई आधारों पर त्रुटिपूर्ण था। मामले में आरोपी को आरोपी को निचली अदालत ने हत्या का दोषी ठहराया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने अपराध को गैर इरादतन हत्या में बदल दिया था।
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पीठ ने कहा कि पहली गलती यह थी कि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल सबूतों की जांच की और फिर अपीलकर्ता की ओर से खुद दर्ज कराई गई एफआईआर की विषय-वस्तु के साथ सीधे उसकी पुष्टि करने की कोशिश की। गवाह का साक्ष्य सलाहकारी प्रकृति का होता है और इसका उपयोग केवल आरोपी को हत्या का दोषी ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।
राज्य के वकील ने कहा कि अपीलकर्ता ने 2019 में पुलिस थाने में जाकर मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। पीठ ने कहा कि किसी भी अन्य सबूत की तरह अभियुक्त का आचरण उन परिस्थितियों में से एक है, जिस पर अदालत रिकॉर्ड में मौजूद अन्य प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ विचार कर सकती है।
अदालत ने कहा कि जब भी अदालत के सामने ऐसे सवाल आएं कि अपराध हत्या है या गैर इरादतन हत्या तो इस पर तीन चरणों में विचार किया जाना चाहिए। पहले चरण में देखा जाए कि क्या अभियुक्त ने ऐसा कृत्य किया जिससे किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु हुई। पीठ ने कहा कि आरोपी के कृत्य और मृत्यु के बीच कारण का सबूत दूसरे चरण की ओर ले जाता है। इसमें यह विचार किया जाए कि क्या आरोपी का कृत्य आईपीसी की धारा 299 के तहत गैर इरादतन हत्या में आता है।
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पीठ ने कहा कि दूसरे चरण में सकारात्मक परिणाम मिलें तो तीसरे चरण में आईपीसी की धारा 300 हत्या के आवेदन पर विचार किया जाए। इस स्तर पर अदालत को यह तय करना होगा कि अभियोजन पक्ष द्वारा साबित किए गए तथ्य मामले को धारा 300 में निहित हत्या की परिभाषा के चार खंडों में से किसी के दायरे में लाते हैं या नहीं।
इसमें कहा गया है कि यदि इसका परिणाम नकारात्मक है, तो अपराध गैर इरादतन हत्या होगा। इसमें धारा 304 के पहले या दूसरे भाग के तहत दंड दिया जाएगा। साथ ही यह ध्यान रखा जाए कि धारा 299 का दूसरा या तीसरा खंड लागू होता है या नहीं। पीठ ने कहा कि अगर तीसरे चरण में परिणाम सकारात्मक है, लेकिन मामला धारा 300 में उल्लिखित किसी अपवाद के अंतर्गत आता है, तो भी अपराध गैर इरादतन हत्या होगा और आईपीसी की धारा 304 के भाग 1 के तहत दंड दिया जाएगा।