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अटल, अटल थे, अटल ही रहे!

Sat, 18 Aug 2018 12:19 PM IST
डॉ. आशीष जैन
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atal bihari vajpayee
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यद्यपि उन्हें सक्रिय राजनीति व सार्वजनिक जीवन से दूर हुए एक दशक से भी अधिक समय हो गया था। फिर भी यह आश्वासन था, कि वे हैं, यहीं कहीं, हमारे बीच। पर अब तो वो आश्वासन भी जाता रहा। मन व्यथित है। इस रिक्तता को कोई न भर पाएगा। राजनीति के जिस पायदान पर उन्होंने स्वयं को स्थापित किया, कोई उसे छू भी पाये, इसकी संभावना शून्य है। उनका व्यक्तित्व, प्रकाशित कविता संग्रहों की संख्या अथवा संसद में लोकसभा की सीटों से नहीं आंका जा सकता। 
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मेरा एमबीबीएस पूर्ण हो चुका था। और मैं अगली परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, जब मई 1998 में बुद्ध दूसरी बार मुस्कुराए। इस काल में टीवी ने दूरदर्शन के माध्यम से अपना स्थान बना लिया था पर अन्य निजी चैनल उपलब्ध नहीं थे। सोशल मीडिया की तो परिकल्पना भी तैयार नहीं थी। समाचार आपको ढूंढते हुए स्वयं नहीं आते थे, आपको खोजना पड़ता था। और उनकी पुष्टी दूरदर्शन अथवा आकाशवाणी के माध्यम से होती थी, अथवा अगले दिन यह समाचार दैनिक में प्रकाशित होता और विस्तार से चाय के साथ पढ़ा जाता।

टीवी पर देखा, सुनहरी धूप से सजे लॉन में राष्ट्रध्वज के समक्ष खड़े हो कर जब पोखरण द्वितीय की घोषणा अटलजी ने की। रोंगटे खड़े हो गए थे। एक अजीब सी सिहरन थी जो आज भी मुझे याद है, पर उसे बयान करने को शब्द नहीं मिल रहे। यह अनुभूति जो लॉर्ड्स 1983 और वानखेडे 2011 में मिली विश्वकप की जीत से भिन्न थी। 
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यह घोषणा स्वयं भी एक छोटे मोटे परमाणु विस्फोट से कम नहीं थी। इससे पहले भारत ‘सुई-तक-आयात’ की स्थिती से बाहर तो आ चुका था पर विश्व की आंखों से आंख मिला कर चुनौती देने की यह पहली घटना साक्षात देखी थी। इसके पहले 1971 का पाक आत्मसमर्पण जैसी कई और बड़ी व ऐतिहासिक घटनाएं हुई अवश्य थीं पर मेरी पीढ़ी ने वह सब बस सुना ही था और इन विषयों में सीमित जानकारी थी।

पोखरण को प्रथमदृष्टया अनुभव करना रोचक था। क्या हुआ, कैसे किया और उससे भी महत्वपूर्ण अब क्या होगा की चर्चा कई हफ्तों तक सड़क के किनारे वाली चाय की गुमटी पर और कैंटीनों में होती रही। चाय की चुस्कियों के साथ उस संवाद का स्वाद आज भी मुंह में बसा है। इस एक घटना ने विश्व में भारत को और भारत में अटल जी को एक पायदान ऊपर बैठा दिया था। 
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'टेप घिस जाने तक ‘रिवाइंड’ कर-कर के अटलजी का भाषण सुनते'

1992 में अयोध्या में जो कुछ घटित हो रहा था प्राय: हम तक नहीं पहुंच पा रहा था। जानकारियां छन-छनकर आती थीं। समाचार पत्रों में जो आता था, वह अधूरा और अस्पष्ट लगता था। देश गंभीर दौर में था। हम लोग किराये के वीसीआर और ‘न्यूजट्रैक’ के कैसेट ले कर आते और मोहल्ले के बड़े लोगों के साथ घंटों देखते थे। साथ में जो वाद विवाद होते और तर्क रखे जाते उन्होंने हमारी पीढ़ी के मानस पटल को तराशा। कुछ विरोध में और कुछ पक्ष में। यह वो काल था जब ‘फेक न्यूज’ अफवाह की शक्ल में आती थी। 

फिर जो होना था वह हुआ, हमने देखा भी, महसूस भी किया और भुगता भी। पर ‘रिवाइंड’ कर-कर के अटलजी का भाषण तब तक सुनते जब तक कैसेट पूरी तरह घिस नहीं जाती। उनका एक एक वाक्य और वाक्यों के बीच आंखों को मूंद कर दिया हुआ विराम, अपने सिर को हलका सा एक ओर झुका कर, लहराते हाथों को हवा में ही एकाएक रोकने की अद्भुत कला स्तब्ध कर देती थी। यहां तक कि उग्र और अधीर कारसेवक भी आधे खुले मुंह से एकटक सन्नाटे को सुनते। उनकी वक्तव्य कला का कोई सानी न था।

मैं उस दौर का साक्षी हूं जब देश में राजनीतिक अनिश्चितताएं समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। जब सदन में बहस पूर्ण होने के पश्चात अटलजी ने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को देने की घोषणा की, तब घंटों से रुके हुए आंसू स्वत: ही छलक पड़े थे। मन में एक पीड़ा थी, अवसाद था। पूरा भाषण देखा था मैंने। क्या चरित्र, क्या शब्द चयन। कोई द्वेष नहीं, कोई मलाल नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। सामने दिख रही हार के बावजूद वे खड़े थे अडिग, अटल। जीत को लालायित और आश्वस्त सांसद निरीह मेमनों की तरह दिख रहे थे। पर उन्होंने जो लिखा वही किया - ना हार मानी, ना रार ठानी। उस दिन वो जीत गए, देश उन्हें हार गया। पर वो रुके नहीं, फिर आए और इस बार और अधिक वेग से। उनका चरित्र अटल था। 

जिस पार्टी को उन्होंने बनाया और दो सांसदों से आज बहुमत की सरकार तक पहुंचाया, वे इस यात्रा में सहभागी रहे और अंत के एक दशक में मूक दर्शक भी। उनके प्रयाण का इससे अच्छा समय और कोई हो ही नहीं सकता जब संपूर्ण भारत में कमल खिल चुका है, जैसी कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी। ऐसा लगता है मानो उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हो। वे जिस उद्देश्य से राजनीति में आए थे, वह उद्देश्य पूर्ण हुआ।

मैं न तो राजनीतिक चिंतक हूं और न ही व्यक्ति परिचय मेरी विधा है। आज व्यथित मन ने जो लिखवा दिया, वही लिख रहा हूं। अटलजी को समर्पित कुछ पंक्तियां भी लिखी हैं, प्रस्तुत है:

आचार अटल
व्यवहार अटल
रोम रोम मे संस्कार अटल
कवि अटल
कविता अटल
हर गीत में विचार अटल
सत्ता में अटल
विपक्ष में अटल
वक्तृत्व कला से सभागार अटल
प्रयास अटल
विश्वास अटल
मनमंदिर के विचार अटल
धर्म अटल
कर्म अटल
राजधर्म की पुकार अटल
नीति अटल
निश्चय अटल
पोखरन की हुंकार अटल
भक्ति अटल
शक्ति अटल
कारगिल का संहार अटल
मित्र अटल
शत्रु अटल
मतभेद में सदाचार अटल
जीवन में अटल
मृत्यु में अटल
शोक का गुबार अटल
हे 'अटल' तुम्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि
॥इति॥
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