गुजरात के राजकोट की रहने वाली शबनम शेख की मुश्किलें उस समय शुरू हो गईं जब वो केवल पांच साल की थी। इतनी छोटी उम्र में वेरावल की रहने वाली इस लड़की की मां का देहान्त हो गया। पेशे से ट्रक ड्राइवर उसके पिता उसके पालन-पोषण को लेकर अनजान थे। मगर जल्द ही उसे अपने पिता के दोस्त और पेशे से ट्रक ड्राइवर मेरामन जोरा के परिवार से प्यार मिलने लगा। जोरा के परिवार ने उसे अपने घर में अपने मजहब का पालन करने की आजादी दी। जब वो 14 साल की हुई तो मुसीबत का एक और पहाड़ उसपर गिरा। उसके पिता कभी वापस ना आने के लिए शहर छोड़कर चले गए।
शबनम के लिए खुशियां उस समय वापस आ गईं जब 20 साल की उम्र में जोरा परिवार ने उसकी शादी एक
मुस्लिम लड़के से करवाई। मेरामन के अपने दो बेटे और एक बेटी हैं। उन्होंने उस शहर में हिंदू-मुस्लिम सद्भावना की कहानी लिखी है जहां पिछले कुछ सालों से दोनों समुदाय के बीच दंगे होते रहे हैं। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के अनुसार शबनम की शादी की। जोरा ने कहा, 'हमने शबनम को अपनी बेटी की तरह पाला है। हमने उसे अपना धर्म और भाषा सीखने की पूरी आजादी दी। उसने कुरान पढ़ी है और नियमित तौर पर नमाज अदा करती है और अपने त्योहारों की तरह ही हिंदू के त्योहारों को मनाया करती है।'
जोरा उस समय शबनम के भविष्य को लेकर चिंतित हो गए जब वो 20 साल की हुई। उन्हें उसके पिता के बारे में कुछ नहीं पता था। साल 2012 में वह अहमदाबाद जाने की बात बोलकर चले गए थे। इसके बाद जोरा ने स्थानीय मुस्लिम नेताओं से संपर्क किया और शबनम के लिए एक मुस्लिम लड़का ढूंढा जो पेशे से ऑटो रिक्शा चलाता है। वह हिंदू परंपरा के अनुसार शबनम का कन्या दान करना चाहते थे और मुस्लिम परंपरा के अनुसार निकाह भी। अंत में फैसला हुआ कि शादी हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के अनुसार होगी।
जोरा के बेटे गोपाल ने कहा, 'हमने हमेशा से ही शबनम को अपने परिवार का सदस्य माना है। उसके ससुराल वाले भी दोनों रीति-रिवाजों से शादी करने के हमारे प्रस्ताव को मान गए।' शादी की शुरुआत मेहंदी और
गणेश पूजा से हुई। इसके बाद मौलवी की उपस्थिति में निकाह हुआ। शबनम ने कहा,' मेरा पालन-पोषण हिंदू परिवार में हुआ है जहां मुझे अपने परिवार से ज्यादा प्यार और स्नेह मिला। मुझे हर तरह की आजादी मिली। मैं उन्हें अपने माता-पिता की तरह मानती हूं।' एक स्थानीय मुस्लिम नेता हसम मुशग्रा ने कहा, 'यह हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों धर्मों के लोगों को इससे कुछ सीखना चाहिए।'