रिश्वत लेकर संसद या विधानसभा में वोट देने वाले जनप्रतिनिधि (सांसद या विधायक) पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं, इस बात का फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ करेगी। शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने जनप्रतिनिधि को आपराधिक अभियोजन से बचने की छूट देने वाले सांविधानिक प्रावधान का मुद्दा पांच सदस्यीय पीठ को रेफर कर दिया है।
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने इस मामले को बड़े पैमाने पर जनहित से जुड़ा हुआ करार दिया। पीठ ने चीफ जस्टिस से इस मामले मे प्रशासनिक स्तर पर बड़ी संविधान पीठ के गठन का आग्रह किया है। बता दें कि इसी मसले का परीक्षण वर्ष 1998 में भी पीवी नरसिंह राव बनाम सीबीआई (झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वतखोरी कांड) मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ कर चुकी है।
इस मामले में शिबू सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों पर रिश्वत लेकर पीवी नरसिंह राव की सरकार के पक्ष में मतदान करने का आरोप था। उस संविधान पीठ के दो जजों का मानना था कि संविधान के अनुच्छेद-105(2)/194(2) के तहत मिली छूट व संरक्षण का प्रावधान संसद में खास तरीके से बोलने या वोट देने के बदले हुई कथित रिश्वतखोरी पर लागू नहीं हो सकता। हालांकि बहुमत का मानना था कि जनप्रतिनिधियों को यह छूट दी जा सकती है।
20 साल पहले पिता और अब बेटी के कारण उठा मामला
करीब 20 साल पहले जहां यह सवाल शिबू सोरेन के चलते उठा था, वहीं अब इस बार यह मुद्दा शिबू सोरेन की बेटी सीता सोरेन के मामले में उठा है। सीता सोरेन पर वर्ष 2012 में राज्यसभा चुनाव के दौरान कथित तौर पर रिश्वतखोरी का आरोप है। सीता सोरेन ने सुप्रीम कोर्ट में झारखंड हाईकोर्ट के फरवरी 2014 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनके खिलाफ अभियोजन चलाने की इजाजत दी गई थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में पाया था कि सोरेने ने आरके अग्रवाल नाम के शख्स से पैसे लिए थे, लेकिन उनके पक्ष में मतदान नहीं किया। इस कारण वह संरक्षण या छूट का दावा नहीं कर सकती।