जिन कैडर अफसरों को तत्काल प्रभाव से अपनी नई पोस्टिंग पर जाने का आदेश मिला है, उनमें आईजी अरूण कुमार को आरएएफ सेक्टर से आईएसएएम माउंट आबू भेजा गया है। प्रदीप कुमार सिंह, जो हेडक्वार्टर में आईजी इंटेलिजेंस का पदभार संभाल रहे थे, उन्हें पश्चिम बंगाल सेक्टर की कमान सौंपी गई है।
कैडर अफसरों और कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वैलफेयर एसोसिएशन का आरोप है कि ये तबादले अफसरों को परेशान करने के लिए किए गए हैं। केंद्र सरकार और खुद बल मुख्यालय ने भी ये हिदायत जारी की थी कि लॉकडाउन में कोई भी तबादला न किया जाए।
यहां तक कि सभी कोर्स और ट्रेनिंग भी बंद कर दी गई थी। एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह का कहना है कि इन तबादलों में पूरा भेदभाव किया गया है। सच्चाई यह है कि अभी किसी तरह की ऑपरेशनल जरूरत नहीं थी, केवल इसकी आड़ में कैडर अफसरों पर गाज गिराई गई है।
कई ऐसे आईपीएस अफसर हैं, जिन्हें पसंदीदा पोस्टिंग मिली है। उन्हें मुख्यालय से बाहर गए भले ही एक-दो साल हुए थे, लेकिन वे बेहतर पोस्टिंग लेने में कामयाब हो गए। कैडर अधिकारी, जिन्हें मुख्यालय से बाहर गए हुए चार वर्ष या उससे ज्यादा का समय हो चुका है, लेकिन उन्हें दिल्ली नहीं लाया गया।
आईजी रणदीप दत्ता ऐसे कैडर अफसर हैं, जो करीब दो दशक बाद दिल्ली लौटे थे। वे 16 मार्च 2018 को दिल्ली आए, लेकिन अब उन्हें मुख्यालय से बाहर भेज दिया गया है। दत्ता की दलील थी उनके पिता की आयु 90 साल है, उनका इलाज कराना है, लेकिन अब उन्हें यहां से रवाना कर दिया गया।
इसी तरह विक्रम सहगल को दो साल भी पूरे नहीं हुए थे कि उन्हें भी राजस्थान भेज दिया गया है। आईपीएस अंशुमन यादव, जिन्हें मणिपुर में एक ही साल हुआ था, वे दिल्ली आ गए हैं, जबकि गुवाहाटी में आईजी संजय कौशिक को चार साल हो चुके हैं, लेकिन उनका तबादला दिल्ली नहीं किया गया।
कैडर अफसर कौशिक ने दिल्ली आने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री से लेकर गृह सचिव तक को तबादले का आवेदन दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। दिल्ली या मुंबर्ह मांगा तो ग्वालियर दे दिया गया।