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75th Independence Day: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी ‘वंदेमातरम’ की रचना, जलाया था आजादी का अलख

Sun, 15 Aug 2021 08:34 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में गाया गया
  • काफी कम समय में लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया था वंदेमातरम गीत
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Bankim Chandra Chattopadhyay - फोटो : twitter
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विस्तार
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देश आज स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत किसी भी देश की वो धरोहर होती हैं, जिससे उस राष्ट्र की पहचान जुड़ी हुई होती है। आप राष्ट्रगान के बारे मे तो जानते हैं लेकिन आज हम बताएंगे कि देश का राष्ट्रीय गीत किसने लिखा था, जिसने आजादी के वक्त लोगों में देशभक्ति की अलख जगा दी।

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हमारा राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम है और इस की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। 26 जून 1838 को पैदा हुए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने देशवासियों को अंगेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन के लिए अपनी रचनाओं से प्रेरित किया। उनकी मृत्यु 8 अप्रैल, 1894 को हुई। 

ऐसे हुई राष्ट्रीय गीत की रचना
भारत में उस वक्त ब्रिटिश शासन था, उनका शासन होने कारण हर समारोह में ब्रिटेन का एक गीत था 'गॉड! सेव द क्वीन' गाया जाता था। लेकिन बंकिमचंद्र को यह नहीं भाया और उन्होंने वंदेमातरम की रचना की। इसके बाद इस गीत को भारत के हर समारोह में अनिवार्य कर दिया गया। 
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बंकिमचंद्र तब सरकारी नौकरी में थे। उन्होंने साल 1876 में एक गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया 'वंदेमातरम'। उन्होंने अपनी किताब आनंदमठ में भी संस्कृत में इस गीत को शामिल किया।

इस गीत को पहली बार 1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में गाया गया था। थोड़े ही समय में यह गीत काफी लोकप्रिय हो गया और अंग्रेज शासन के खिलाफ क्रांति का प्रतीक बन गया।

जिन्ना ने किया था विरोध
जब हर अधिवेशन में यह गीत गाया जाने लगा, 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना ने इस गीत का विरोध किया। इसके साथ ही  मुसलमानों ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान के रूप में  स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुस्लिम लीग के एक नेता ने तो यह कह दिया था कि राष्ट्रवाद की आड़ में, भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का प्रचार किया जा रहा है।

मुस्लिम लीग के नेताओं द्वारा गीत का विरोध कविता के बाद के छंद में देवी दुर्गा के संदर्भों पर आधारित था, विशेष रूप से जहां यह कहता है कि "तू दुर्गा, महिला और रानी"। बंकिम चंद्र ने अपने देश की तुलना भारत में सम्मानित और पूज्य नारीत्व के विभिन्न रूपों से की। इसे लेकर मुस्लिम लीग ने कड़ा विरोध किया।

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