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74वां गणतंत्र दिवस: सजीव संविधान से गतिमान गणतंत्र, लंबी यात्रा में खरा उतरा, सफल संसदीय लोकतंत्र का जश्न

Thu, 26 Jan 2023 06:04 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

संविधान किसी भी सफल गणतंत्र का वाहक है। संविधान निर्माताओं ने इसे बनाने के बाद संसद के हवाले तो कर दिया, पर शीर्ष अदालत को इसकी निगहबानी भी सौंपी। संविधान सभा के आखिरी भाषण में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने तीन चेतावनियां भी दीं। उस भाषण के सात दशक बाद आज गणतंत्र की 73वीं वर्षगांठ पर कुछ पल रुककर यह देखना लाजिमी है कि आखिर इस लंबे सफर के बाद हम कहां पहुंचे, आगे कहां जा रहे...बता रहे हैं अपूर्व-
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संसद (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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एक सजीव संविधान से आगे बढ़ रहा भारतीय गणतंत्र आज सफल संसदीय लोकतंत्र का जश्न मना रहा है। 141 बैठकों के बाद 2 साल 11 महीने और 17 दिन में तैयार एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद व 8 अनुसूचियों के साथ स्वतंत्र भारत के संविधान का मूल प्रारूप तैयार हुआ। मूल संविधान से लेकर अब तक देश ने लंबी यात्रा तय की है और इस दौरान संविधान में समय-समय पर कुछ संशोधन भी किए गए। इन संशोधनों के कारण आज संविधान में 12 अनुसूचियों सहित 400 से अधिक अनुच्छेद हैं।

  • जीवंत क्योंकि... 73 साल में 104 संविधान संशोधन किए जा चुके हैं  हालांकि, सिर्फ एक को बताया गया असांविधानिक।
  • इसमें भरोसा क्योंकि...सात दशक में 350 से अधिक बार सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण। चुनाव बने दुनिया में लोकतंत्र के आदर्श।
  • चुनाव और संविधान में संशोधन बने सफल गणतंत्र की ताकत

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भारतीय गणतंत्र के 73 साल के इतिहास में 104 संविधान संशोधन हुए। सिर्फ राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन से संबंधित 99वें संविधान संशोधन को असांविधानिक बताया गया। यह बताता है कि देश के नागरिकों की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए शासन के दायरे का किस प्रकार समयानुकूल विस्तार किया गया। यह साबित करता है कि हमारा संविधान जीवंत है। वहीं, सात दशक में केंद्र और राज्यों में सत्ता का 350 से अधिक बार शांतिपूर्ण हस्तांतरण इसके प्रति भरोसे का सबूत है।

इन सबके बीच आत्मनिर्भर भारत अपनी तमाम उपलब्धियों के साथ एक अहम मोड़ पर है। न्यायपालिका और विधायिका के बीच जजों की नियुक्ति पर छिड़ी बहस बढ़ते-बढ़ते संविधान तक पहुंच चुकी है। संविधान के मूल ढांचे को लेकर विधायिका और न्यायपािलका आमने-सामने हैं। हालांकि, तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यह याद रखना होगा कि हमारे संसदीय लोकतंत्र ने समय की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध किया है। कभी अस्थिरता का शिकार नहीं हुआ। संविधान में संशोधन और चुनाव  दोनों अहम प्रक्रियाएं हमारे गणतंत्र को आगे ही लेकर आई हैं।

  • अंतर्विरोधों के बावजूद समय की कसौटी पर खरा उतरा लोकतंत्र

 

फैसले जो बने मील के पत्थर

पहला संशोधन

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संसद में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की ओर से 10 मई, 1951 को पेश किया गया। 18 जून, 1951 को संसद ने इस प्रस्ताव को पारित किया।

  • इस संविधान संशोधन के जरिये भाषण तथा अभिव्यक्ति की आजादी का महत्वपूर्ण अधिकार आम आदमी को दिया गया।

अंतिम संशोधन
126वां संविधान संशोधन विधेयक 2 दिसंबर, 2019 को संसद में लाया गया। यह भारतीय संविधान में होने वाला 104वां संशोधन था।

  • इसके जरिये संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष के लिए बढ़ाया गया।

कदम दर कदम अहम पड़ाव

सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : सोशल मीडिया
भारतीय संविधान में सातवां संशोधन 1956 को लागू किया गया था। इसमें भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया। तीन श्रेणियों में राज्यों के वर्गीकरण को समाप्त करते हुए राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। इसके साथ ही, इनके अनुरूप केंद्र एवं राज्य की विधान पालिकाओं में सीटों को पुनर्व्यवस्थित किया गया।
  • राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज, अब कॉलेजियम पर बहस
99वें संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने असांविधानिक घोषित किया
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के गठन से संबंधित 99वें संविधान संशोधन को असांविधानिक करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्तूबर, 2015 को ‘जजों द्वारा जजों की नियुक्ति’ की 22 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने वाले एनजेएसी कानून, 2014 को निरस्त कर दिया था। पांच जजों की संविधान पीठ ने चार-एक के बहुमत से फैसला लिया था। हालांकि, इस पर व्यापक विमर्श जारी है।

जीएसटी व्यवस्था लागू
केंद्र सरकार ने लोकसभा में 19 दिसंबर 2014 को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के लिए संविधान में संशोधन किया था। इसके बाद से संसद और राज्य विधानसभाएं जीएसटी पर कानून बनाने के लिए समवर्ती शक्तियों से लैस हो गईं। संविधान में नया अनुच्छेद 279ए जोड़कर जीएसटी परिषद के गठन का प्रावधान किया गया। 2016 में अधिसूचना जारी हुई।

देश में वस्तु एवं सेवा कर लागू करने के लिए भारतीय संविधान में 101वां संशोधन किया गया। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच वित्तीय बाधाओं को दूर करके एक समान बाजार को बांध कर रखना है। यह संपूर्ण भारत में वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाने वाला एकल राष्ट्रीय एकसमान कर है।

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019
साल 2019 में संसद ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित किया। नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए लाया गया था। यह नागरिकता के लिए विभिन्न आधार प्रदान करता है।

सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण
103वें संविधान संशोधन के जरिये आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को शिक्षा और नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। राज्यसभा में इससे संबंधित बिल के समर्थन में 165 मत पड़े, जबकि सात सदस्यों ने विरोध किया। वहीं, लोकसभा में इसके समर्थन में 323 मत पड़े जबकि विरोध में केवल 3 मत पड़े।

भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन

1976 में जुड़ा समाजवादी और धर्मनिरपेक्षता शब्द
संविधान में समाजवादी शब्द 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया था। यह अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है। जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना, सभी को बराबर का दर्जा और अवसर देता है। इसी तरह, धर्मनिरपेक्षता शब्द भी प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता तय करता है।  

दल-बदल कानून से नेताओं पर शिकंजा
1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिये संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसे दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसमें दल बदलने वालों की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान किया गया।

ये भी जानिए

हीलियम भरे बॉक्स में मूल प्रतियां
संविधान की मूल प्रतियां संसदीय पुस्तकालय में रखी हैं। इन्हें हीलियम से भरे एक बॉक्स में रखा गया है और नेफ्थलीन गेंदों के साथ फलालैन के कपड़े में लपेट कर रखा गया है।
  • संविधान की मूल प्रति को हिंदी और अंग्रेजी में प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने लिखा था। इसे लिखने में उन्हें पूरे छह महीने का वक्त लगा था। कोई मेहनताना भी नहीं लिया।
  • संविधान दिवस : डॉ. भीमराव आंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए भारत सरकार ने उनकी 125वीं जयंती वर्ष के रूप में 26 नवंबर, 2015 को पूरे देश में पहली बार संविधान दिवस मनायाा।
  • 64 लाख रुपये हुए थे खर्च : 141 बैठकों के बाद स्वतंत्र भारत के संविधान का मूल प्रारूप तैयार हुआ। कुल खर्च 64 लाख रुपये आया था।

तानाशाही के दबाव से बचाना सांविधानिक गणतंत्र का काम

गणतंत्र दिवस - फोटो : अमर उजाला
लोकतंत्र का मुख्य उद्देश्य लोगों की इच्छा सर्वोपरि रखना, जबकि सांविधानिक गणतंत्र का उद्देश्य लोगों को तानाशाही के चंगुल से बचाना है। भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बड़ी-से-बड़ी सरकारी संस्था भी नहीं कर सकतीं। इस संबंध में संविधान निर्माता बाबा साहेब की ये तीन चेतावनियां आज भी अहम हैं...

1. बदलें...लोकतंत्र में विरोध के तरीके
सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को छोड़ना चाहिए।

2. छोड़ें...व्यक्ति-सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाने  की प्रवृति
राजनीति में, भक्ति या नायक की पूजा, यह पतन और अंततः तानाशाही के लिए एक निश्चित मार्ग सुनिश्चित करती है।

3. न करें संतोष... राजनीतिक लोकतंत्र पा लेने भर से
राजनीतिक लोकतंत्र प्राप्त कर लेने भर से असमानता खत्म नहीं हो जाती है। लंबे समय तक समानता से वंचित रहे, तो हम राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में डाल देंगे। इसलिए संतुष्ट न हों।
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संविधान-गणतंत्र पर आईं चुनौतियों से आता रहा निखार

भारत का संविधान। - फोटो : अमर उजाला
संविधान में दी गई गारंटी और आज उनकी स्थिति
यह साल संविधान और गणतंत्र पर आए खतरों को पहचानने के लिए अहम रहेगा। अनुच्छेद 14 से 18  जनता के बीच समानता की गारंटी देता है और यह मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 38(2) कहता है कि सरकार आर्थिक असमानता दूर करेगी। अनुच्छेद 39(सी) के अनुसार सरकार ऐसी नीतियां बनाएगी जो धन का केंद्रीकरण रोकेगा।
  • असलियत : सिर्फ 7 लोगों के पास देश के 50 फीसदी लोगों के बराबर धन है।

रोजगार-शिक्षा पर फोकस
अनुच्छेद 41 कहता है, राज्य रोजगार, शिक्षा को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा।
असलियत : एक अनुमान के अनुसार सिर्फ  कोरोना की दूसरी लहर में एक करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हुए। पिछले साल दिसंबर में बेरोजगारी बढ़कर 16 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई।
  • अच्छी शिक्षा सिर्फ कुछ लोगों को उपलब्ध है और अधिकांश स्कूल बेहद खराब हालत में हैं।
  • अनुच्छेद 39 ए कहता है कि हमारी कानून व्यवस्था न्याय को बढ़ावा देगी।
  • असलियत : 3.3 करोड़ मामले अदालतों में लंबित हैं और कई मामलों को निपटाने में दशकों लग जाते हैं।

बच्चों के पोषण के लिए भी प्रावधान
अनुच्छेद 39(एफ) सरकार को निर्देशित करता है कि बच्चे एक स्वस्थ वातावरण में बढ़ेंगे। वहीं, अनुच्छेद 47 कहता है कि सरकार बच्चों में पोषण का स्तर बढ़ाएगी।
असलियत : आजादी के 7 दशक बाद भी भारत के 47 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। दुनिया के एक तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में हैं। इस मामले में हम सोमालिया जैसे देशों से भी पिछड़ रहे हैं।

अनुच्छेद 21 नागरिकों को स्वतंत्रता की गारंटी देता है
असलियत : देशद्रोह और निरोधात्मक हिरासत के कानून इस पर सवाल उठाते हैं। एक ट्वीट भी आपको जेल भेजने और आपकी स्वतंत्रता का हरण करने के लिए काफी है। अभिजीत अय्यर मित्रा के केस में आजादी के पहरुओं ने ही उनकी जमानत यह कहते हुए खारिज कर दी कि आप जेल में ही सुरक्षित हैं।
  • बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून साझा करने पर प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र को जेल में डाल दिया गया। महाराष्ट्र में नेताओं को भ्रष्ट दिखाने वाला कार्टून बनाने पर असीम त्रिवेदी गिरफ्तार कर लिए गए।

सबसे विस्तृत संविधान
भारत का संविधान 26 नवंबर, 1949 को बनकर पूर्ण हुआ था। सर आई जेनिंग्स के शब्दों में, यह विश्व का सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन का प्रावधान है।
  • अन्नदाता-मजदूरों की भी थी चिंता: अनुच्छेद 43 कहता है, राज्य मजदूरों के लिए जीवनयापन योग्य मजदूरी सुनिश्चित करेगा।
असलियत : बेरोजगारी की ऊंची दर और ठेका प्रणाली के कारण अधिकांश मजदूर उच्च पारिश्रमिक मांगने की हिम्मत भी नहीं करते।
  • पर्यावरण ने भी खींचा था ध्यान: अनुच्छेद 48 राज्य को पर्यावरण की स्थिति सुधारने का निर्देश देता है।
असलियत : दिल्ली समेत देश के अधिकांश शहरों में प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। हमारी नदियां भी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं।
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