स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को जानकारी दी कि सितंबर महीने की दवा चेतावनी रिपोर्ट में केंद्रीय औषधि प्रयोगशालाओं ने विभिन्न कंपनियों की ओर से बनाई गई दवाओं के 42 नमूनों को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया। इन नमूनों को 'मानक गुणवत्ता का नहीं' (एनएसक्यू) घोषित किया गया है। इसके अलावा, राज्य औषधि जांच प्रयोगशालाओं ने भी दवाओं के 288 नमूनों को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया है।
दवाओं की गुणवत्ता की जांच कैसे होती है?
मंत्रालय ने बताया कि नियमित नियामक निगरानी गतिविधि के तहत मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाई गई और नकली दवाओं की सूची हर महीने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के पोर्टल पर जारी की जाती है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बयान में कहा कि सितंबर 2026 में केंद्रीय औषधि प्रयोगशालाओं ने दवाओं के 42 नमूनों को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया। वहीं, राज्य औषधि जांच प्रयोगशालाओं ने दवाओं के 288 नमूनों को गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया।
गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं मानने का क्या मतलब है?
मंत्रालय ने कहा कि दवा के नमूने को मानक गुणवत्ता का नहीं तब माना जाता है, जब वह तय गुणवत्ता मानकों में से किसी एक या अधिक पर खरा नहीं उतरता। यह कमी सरकारी प्रयोगशाला में जांचे गए दवा के बैच से जुड़ी होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में उपलब्ध दूसरी दवाओं की गुणवत्ता पर भी सवाल है।
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दिल्ली में भी नकली दवा का एक नमूना मिला
इसके अलावा, दिल्ली से दवा का एक नमूना नकली पाया गया। इसे अनधिकृत निर्माताओं ने बनाया था। उन्होंने इसके लिए एक दूसरी कंपनी के ब्रांड नाम का इस्तेमाल किया था। यह ब्रांड नाम उस कंपनी के स्वामित्व में है। मंत्रालय ने बताया कि इस मामले की जांच चल रही है। कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
क्या कार्रवाई होती है?
मंत्रालय ने कहा कि गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरने वाली और नकली दवाओं की पहचान के लिए नियमित रूप से कार्रवाई की जाती है। यह कार्रवाई राज्य नियामकों के सहयोग से की जाती है। इसका उद्देश्य ऐसी दवाओं की पहचान करना और उन्हें बाजार से हटाना है।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग से जुड़ी अनैतिक गतिविधियों पर लगेगी रोक?
दवा कंपनियों की मार्केटिंग से जुड़ी अनैतिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सरकार ने एक समिति बनाई है। रसायन और उर्वरक मंत्रालय के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, औषध विभाग ने यह समिति गठित की है। यह समिति दवाओं की मार्केटिंग से जुड़े मौजूदा नियमों की समीक्षा करेगी। साथ ही, इस क्षेत्र में अनैतिक गतिविधियों पर रोक लगाने के उपाय सुझाएगी।
समिति की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य एम श्रीनिवास करेंगे। पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन और मेदांता के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) नरेश त्रेहान इसके सदस्य होंगे।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय के बयान के अनुसार, समिति मौजूदा नियामक व्यवस्था की जांच करेगी। वह निगरानी, देखरेख और नियमों को लागू करने की व्यवस्था मजबूत करने के उपाय भी सुझाएगी। इसका उद्देश्य दवाओं की मार्केटिंग से जुड़ी अनैतिक गतिविधियों पर रोक लगाना है। समिति को अपनी पहली बैठक की तारीख से दो महीने के भीतर सिफारिशें देनी होंगी। इसके लिए संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श किया जाएगा।
दवाओं की मार्केटिंग के लिए क्या हैं मौजूदा नियम?
दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए समान संहिता (यूसीपीएमपी) पहली बार 2015 में लागू की गई थी। यह स्वैच्छिक व्यवस्था थी। इसका नेतृत्व दवा उद्योग करता था। इसका उद्देश्य नैतिक तरीके से दवाओं की मार्केटिंग को बढ़ावा देना और दवा कंपनियों तथा स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच संपर्क को नियमों के दायरे में रखना था।
बाद में औषध विभाग ने यूसीपीएमपी 2024 लागू की। इसने 2015 की संहिता की जगह ली। इसमें नियमों को लागू करने की व्यवस्था को मजबूत किया गया। यह संहिता फिलहाल लागू है। समिति को निगरानी और नियामक व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत की भी जांच करनी है। इसके साथ ही, वह इन उपायों को लागू करने के लिए उचित नियामक, वैधानिक या अन्य कानूनी कदम सुझाएगी।