इंसान ही नहीं, हाथियों को भी शराब काफी पसंद होती है। वे शराब को बड़ी आसानी से सूंघ लेते हैं और फिर वे उसकी खोज में लग जाते हैं। वहीं, अगर उन्हें महुआ से बनाई गई शराब मिल जाए तो कहने ही क्या। हाथियों को महुआ से बनी हुई शराब खूब पसंद होती है। अगर इसकी महक उन्हें लग जाए तो हाथी इसकी खोज में तो कई बार पूरा जंगल तक छान मारते हैं। ऐसा ही एक मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के एक गांव में सामने आया। यहां करीब दो दर्जन हाथियों को शिलीपाड़ा काजू जंगल के पास महुआ से बनाई जाने वाली शराब को पीने के बाद सोते दिखाई दिए। ग्रामीणों ने इस बारे में जानकारी दी है।
क्योंझर जिले के शिलीपाड़ा काजू जंगल के पास रहने वाले लोगों ने बताया कि वे लोग जंगल में पारंपरिक रूप से महुआ से देशी शराब बनाते हैं। इसे बनाने के लिए वे लोग जंगल में गए थे। जहां उन्होंने महुआ के फूलों को किण्वन के लिए बड़े बर्तनों में पानी के अंदर रखा गया था। जब वे सुबह 6 बजे मौके पर गए तो देखा कि सभी बर्तन टूटे पड़े थे और किण्वित पानी गायब था। उन्होंने यह भी कहा कि मौके पर करीब दो दर्जन हाथी सो रहे थे। एक ग्रामीण नरिया सेठी ने कहा कि उन्होंने किण्वित पानी का सेवन किया और नशे में धुत हो गए। उन्होंने बताया था कि मौके पर नौ हाथी, छह मादा और नौ हाथियों के बच्चे सो रहे थे।
पूरी तरह नहीं बनी थी शराब
ग्रामीणों ने बताया कि वह शराब पूरी तरह से नहीं बनी थी। महुआ से शराब बनाने की प्रक्रिया अभी अपने शुरुआती चरणों में ही थी। वहीं, जब ग्रामीणों को हाथियों को जगाने की कोशिश में नाकामी मिली तो उन्होंने वन विभाग को इसकी जानकारी दी। जानकारी पाकर मौके पर पहुंचे वन विभाग के कर्मचारियों को पटाना वन परिक्षेत्र अंतर्गत जंगल में हाथियों के झुंड को जगाने के लिए ढोल पीटना पड़ा। वन विभाग के कर्मियों की काफी कोशिशों के बाद हाथियों का झुंड जागने के बाद वहां से चला गया। ग्रामीण सेठी ने कहा कि हाथियों का झुंड सुबह करीब 10 बजे वहां से चला गया।
वन विभाग के अधिकारियों ने दी ये जानकारी
वन रेंजर घासीराम पात्रा ने इसके बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जागने के बाद हाथी फिर जंगल के अंदर चले गए। हालांकि उन्होंने किण्वित महुआ पीने के बाद हाथियों के नशे में होने को लेकर कोई जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि शायद हाथी वहां आराम कर रहे थे।
बता दें कि महुआ के पेड़ (मधुका लोंगिफोलिया) के फूलों को एक मादक पेय पदार्थ बनाने के लिए किण्वित किया जाता है। इसे महुआ शराब भी कहा जाता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी पुरुष और महिलाएं पारंपरिक रूप से इस शराब को बनाते हैं।