फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट के ऐसे ऐतिहासिक फैसले, जिनसे बदली देश की तकदीर

Fri, 28 Dec 2018 02:06 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क,अमर उजाला
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
विज्ञापन

2018 देश की न्यायायिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। संविधान के प्रहरी सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसले सुनाते हुए समाज को बदलाव की ओर अग्रसर किया। इस साल सुप्रीम कोर्ट कई लंबित मामलों पर कड़े और ऐतिहासिक फैसले सुनाने के लिए हमेशा याद किया जायेगा। आईये जानते हैं उन जटिल मामलों के बारे में जिन पर देश की सर्वोच्च अदालत ने अहम फैसले सुनाये और आगे भी जिस पर उसे फैसले सुनाने हैं।

विज्ञापन


बाबरी मस्जिद विध्वंस मामला

2018 का साल बाबरी मस्जिद विध्वंस मामला सुप्रीम कोर्ट के लिए बेहद अहम और पेंचीदा रहा है, 1992 में अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के बाद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद से जुड़े जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई रोजाना की गई है। अब उम्मीद है कि इस साल इस चर्चित मामले पर फैसला आ जाएगा।

गौरतलब है कि मुस्लिम संगठनों की ओर से सीनियर ऐडवोकेट कपिल सिब्बल ने कोर्ट में अपील की थी कि 2019 जुलाई के बाद मामले की सुनवाई होनी चाहिए क्योंकि यह कोई आम जमीन विवाद नहीं है और इसका राजनीतिक स्तर पर काफी असर पड़ेगा। इसी केस में संलग्न नमाज के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं बताने वाले 1994 के फैसले को पुन: विचार के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से इंकार कर दिया। जबकि 29 सितंबर से बाबरी मस्जिद मामले में रोजाना सुनवाई होगी जिससे इसी साल फैसला आने की उम्मीद बढ़ गई है।

दिल्ली सरकार ही दिल्ली का 'बॉस'

दिल्ली सरकार बनाम एलजी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 4 जुलाई को फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एलजी की मनमानी नहीं चलेगी और हर मामले में फैसले से पहले एलजी की सहमति की जरूरत नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार अहम है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि दिल्ली के असली बॉस एलजी नहीं, बल्कि दिल्ली सरकार ही है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, लोकतंत्र में रियल पॉवर चुने हुए प्रतिनिधियों में होनी चाहिए, क्योंकि विधायिका के प्रति वे जवाबदेह हैं, लेकिन दिल्ली के विशेष दर्जे को देखते हुए संतुलन बनाना भी जरूरी है। मूल कारण यह है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है।

'आधार' सशर्त हुआ अनिवार्य

आधार कार्ड की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को फैसला सुनाया और कुछ शर्तों के साथ आधार को वैध करार दिया। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी सुनवाई है, इससे पहले 1973 में मौलिक अधिकारों को लेकर केशवानंद भारती केस की सुनवाई करीब पांच महीने चली थी। कोर्ट ने फैसले में कहा कि 'आधार समाज के हाशिए वाले वर्ग (गरीबों) को अधिकार देता है और उन्हें एक पहचान देता है, आधार अन्य आईडी प्रमाणों से भी अलग है क्योंकि इसे डुप्लीकेट नहीं किया जा सकता है।

विज्ञापन


डेटा सुरक्षा को लेकर जस्टिस सिकरी ने केंद्र से कहा कि जितनी जल्दी हो सके मजबूत डेटा संरक्षण कानून लागू करें। अब फैसले के बाद स्कूल,कालेज,छात्रों के लिए आधार की जरूरत नहीं होगी, बैंक खातों से आधार लिंक करना अनिवार्य नहीं होगा, सिम के लिए आधार की मांग नहीं की जा सकती और निजी कंपनियां आधार डाटा नहीं रख सकती।

व्यभिचार कानून हुआ खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 के अंत में एक याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया, जिसमें एडल्टरी यानी व्यभिचार से जुड़े विवादित कानून की सुनवाई हुई। 27 सितंबर को उच्चतम न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने व्यभिचार के लिए दंड का प्रावधान करने वाली धारा को सर्वसम्मति से असंवैधानिक घोषित किया।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हम विवाह के खिलाफ अपराध के मामले में दंड का प्रावधान करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 को असंवैधानिक घोषित करते हैं। अब यह कहने का समय आ गया है कि पति महिला का मालिक नहीं होता है। महिलाओं के साथ असमान व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं हो सकता है।

विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश

निर्भया को मिला इंसाफ

5 साल पहले 16 दिसंबर को हुए निर्भया रेप मामले में पिछले साल मई में मौत की सजा पाए चारों दोषियों की ओर से दाखिल रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 9 जुलाई को फैसला सुनाया। निर्भया गैंगरेप मामले (निर्भया कांड) में सुप्रीम कोर्ट चार दोषियों में से तीन की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुनाके हुए तीनों दोषियों की याचिका खारिज कर दी और अब उनकी फांसी की सजा को उम्र कैद में भी नहीं बदला जाएगा। यानी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी की सजा को बरकरार रखा।

बता दें कि 4 मई को निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने दोषियों विनय, पवन और मुकेश की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा था। दोषी अक्षय ने पुनर्विचार याचिका अभी दायर नहीं की है। मामले की सुनवाई के दौरान दोषियों की तरफ से कहा गया कि ये मामला फांसी की सजा का नहीं। जो गरीब पृष्ठभूमि से आए हुए हैं, वो आदतन अपराधी नहीं हैं इसलिए सुधरने का मौका दिया जाए।

अब समलैंगिकता अपराध नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने एकमत से ये फैसला सुनाया है। करीब 55 मिनट में सुनाए इस फैसले में धारा 377 को रद्द कर दिया गया । सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए कहा कि एलजीबीटी समुदाय को भी समान अधिकार है।

धारा 377 के जरिए एलजीबीटी की यौन प्राथमिकताओं को निशाना बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन प्राथमिकता बाइलोजिकल और प्राकृतिक है। अंतरंगता और निजता किसी की निजी च्वाइस है। इसमें राज्य को दखल नहीं देना चाहिए।  कोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन है। धारा 377 संविधान के समानता के अधिकार आर्टिकल 14 का हनन करती है। 

कावेरी जल विवाद- 'पानी पर सबका हक'

कावेरी जल विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि नदी के पानी पर किसी भी स्टेट का मालिकाना हक नहीं है। कर्नाटक को आदेश दिया कि वह बिलिगुंडलू डैम से तमिलनाडु के लिए 177.25 टीएमसी (थाउजेंड मिलियन क्यूबिक) फीट पानी छोड़े। हालांकि कोर्ट ने तमिलनाडु को मिलने वाले पानी में 14.75 टीएमसी फीट की कटौती की है। यानी अब उसे पहले से 5% कम मिलेगा। वहीं, कर्नाटक के कोटे में 14.75 टीएमसी का इजाफा किया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें