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मोदी सरकार के दो साल: आतंक के घरेलू तंत्र पर काबू लेकिन आईएस बनी नई चुनौती

Thu, 26 May 2016 08:15 AM IST
गुंजन कुमार/ अमर उजाला,नई दिल्ली
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एनएसए की संस्था को मिली अभूतपूर्व ताकत, महिमामंडित डिप्लोमेसी के बावजूद नहीं शुरु हुई पाकिस्तान से साथ बातचीत - फोटो : PTI
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नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद गृहमंत्रालय और संबंधित एजेंसियों का आंतरिक सुरक्षा पर खास फोकस रहा। पिछले दो साल में सरकार घरेलू आतंकवाद और नक्सलवाद पर खासा काबू पाने में तो कामयाब रही। लेकिन सीमा पार से पठानकोट जैसे बड़े आतंकी हमले ने आतंकवाद निरोधी तंत्र की कई कमजोरियों को उजागर भी किया। 
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उधर अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन आईएसआईएस की मुसलिम युवाओं में लगी सेंध ने देखते देखते सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी  कर दी है। हालांकि गृहमंत्री राजनाथ  सिंह आईएस को बड़ी समस्या नहीं मान रहे। राजनाथ का मानना है कि समाज की धर्मनिरपेक्ष जड़े आईएस को भारत में कामयाब नहीं होने देगी। लेकिन सुरक्षा तंत्र इंडियन मुहाहिद्दीन और आईएस केसंभावित सांठगांठ पर पैनी नजर रख रही है। पिछले कुछ महीनों  में आईएस में शामिल होने वाले युवकों की गिरफ्तारी उसी का नतीजा है। गृहमंत्री ने यह माना है कि सरकार के सामने साईबर क्राईम और इंटरनेट व सोशन मीडिया का गलत इस्तेमाल आईएस से बड़ी चुनौती है।

एनएसए की संस्था को मजबूती - 
आंतरिक सुरक्षा मामले में गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय से इतर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) की संस्था को अभूतपूर्व ताकत दी गई है। पिछले दो साल में पाकिस्तान, चीन और खाड़ी के देशों से बातचीत में एनएसए अजीत दोभाल की बड़ी भूमिका रही है। पाकिस्तान के साथ उच्स्तरीय स्तर पर बातचीत की जमीन  तैयार करने के जिम्मेदारी भी दोभाल और उनकी टीम को दी गई है। यूपीए सरकार की पॉलिसी से हटते हुए पीएमओ की तरफ से एनएसए को अधिकार दिया गया है कि वह विदेश, रक्षा और गृह समेत किसी भी मंत्रालय को निर्देश दे सकते हैं। हालांकि पठानकोट हमले में सुरक्षा बल की कार्रवाई में एनएसए केरोल पर गंभीर सवाल उठे थे।
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महिमामंडित डिप्लोमेसी के बावजूद पाकिस्तान से नहीं शुरु हो सकी बातचीत-
मोदी के शपथ ग्रहण समारोह से ही पाक प्रधानमंत्री नवाज  शरीफ से शुरु हुई नजदीकी का दो साल में कोई ठोस फायदा निकल कर सामने नहीं आ सका। आतंकवाद से साथ बातचीत जारी रखने की दोनों सरकार की प्रतिबद्धता के बावजूद यूपीए सरकार के दौरान रुकी उच्चस्तर की बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई है। हालांकि एनएसए अजीत दोभाल पाक से साथ पठानकोट हमले की जांच में विश्वसनीय प्रगति लाने की भरपूर कोशिश में हैं। लेकिन यह गाड़ी भी रुक रुक कर चल रही है। 25 दिसंबर को अफगानिस्तान से लौटते समय लाहौर का औचक पड़ाव भी संबंधों केबर्फ पिघलाने में मददगार साबित नहीं हो सका।

जम्मू-कश्मीर में साझा सरकार लेकिन घाटी की आतंकी तस्वीर धुंधली- 
दो साल केदौरान पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद और फिर उनकी बेटी मेहबूबा मुफ्ती से साथ राज्य में बनी साझा सरकार आतंकवाद और अलगाववाद की तस्वीर में ज्यादा बदलाव नहीं ला सकी है। हालांकि सीमा  पर सख्ती और सीमा पार से फायरिंग के जवाबी हमले केलिए सेना और बीएसएफ को खुली छूट देकर सरकार ने कड़ा सदेश जरुर दिया है। लेकिन घाटी की जमीनी हकीकत में खास तब्दीली नहीं होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का  सबब बना हुआ है। केंद्र की ओर से वहां केयुवकों को मुख्य धारा में शामिल करने की यूपीए के समय से चली आ रही योजनाओं को और मजबूती दी  गई है। कश्मीरी  पंडितों को घाटी में वापस बहाल करने की मोदी सरकार की योजना को खास गति नहीं दी जा सकी है।

पठानकोट हमले में सरकार की किरकिरी - 
सटीक खुफिया जानकारी के बावजूद पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले ने सरकार के सुरक्षा संबंधी दावों को गंभीर चुनौती दी। इतना ही नहीं हमले केबाद सुरक्षा बल की कार्रवाई खत्म होने से पहले ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सफल ऑपरेशन के ट्वीट ने सरकार की खासी  किरकरी करवाई। इसकेअलावा आतंकियों की संख्या को लेकर संशय से भी एजेंसियों के तालमेल की कमी को उजागर किया। इतना ही नहीं कार्रवाई में एनएसए के रोल की भी ङ्क्षनदा  हुई। हालांकि एनएसए अजीत दोभाल ने यह बयान देकर मामले को हल्का करने किया  कि अगर सेना केसाथ एनएसजी को भेजने का फैसला नहीं लिया  गया होता तो तबाही ज्यादा होती।

नक्सलवाद पर कसा शिकंजा- 
मोदी सरकार के दो  साल में सुरक्षा एजेंसियां नक्सल पर खासा अंकुश  लगाने में कामयाब रही है। इसका एक उदाहरण दो साल में नक्सलियों के नीचले कैडर की सैकड़ों की संख्या में हुए आत्मसमर्पण से मिलता है। आंकड़ों के मुताबिक  पिछले दो  साल में  उड़ीसा और आंध्र  प्रदेश के आसपास करीब आठ सौ नक्सली हथियार छोड़  मुख्य धारा में शामिल  हुए हैं। अर्धसैनिक बलों ने जंगलों में अपनी मौजूदगी का ऐसा मकडजाल बिछाया है कि नक्सलियों की आवाजाही रुक गई है। इसकी वजह से दूर दराज केइलाकों में सड़क और अन्य   सुविधाओं का निर्माण आसान हो गया है। हालांकि नक्सलियों का सबसे महफूज गढ़ अबूजमाड़ के जंगल एजेंसियों केलिए अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। 
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