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बिना हाथों के अजय ने जीत ली दुनिया, यूपी बोर्ड में मिले 71 फीसदी अंक

Sat, 21 May 2016 04:18 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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बिना हाथों के अजय ने जीत ली दुनिया - फोटो : TOI
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16 साल के अजय कुमार ने खुद को साबित करने के लिए सिर्फ मेहनत की। क्योंकि उसके पास खुद को साबित करने के लिए मेहनत ही एक मात्र उसका विकल्प था। अजय किसी के सहारे नहीं था और न ही कभी उसने खुद को इसके लिए मजबूर किया। दोनों हाथ न होने के बावजूद अजय कुमार ने जीतोड़ मेहनत की और खुद को साबित कर दिया। अजय कुमार ने यूपी बोर्ड की दसवीं परीक्षा अपने पैरों से दी और परीक्षा में 71.8 फीसदी अंक प्राप्त करके अपने पैरों और इच्छा शक्ति की असली ताकत दिखा दी।   
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अजय कुमार उत्तर प्रदेश में मैनपुरी जिले के बोगांव ग्राम का रहने वाला है। जिस तरह से आम लोग अपने हाथों की उंगलियों में पेंसिल या पेनदबाकर परीक्षा देते हैं। ठीक उसी तरह से अजय अपने पैरों की उगंलियों की बीच में पेन या पे‌सिंल दबाकर परीक्षा देता है। ऐसे में कभी भी उसको इस बात का एहसास नहीं होता कि उसके शरीर में कोई शारीरिक कमी है। अजय अपने ख्वाब को पूरा करने में जुटा हुआ है। अजय का ख्वाब इंजीनियर बनने का है।
 
अजय एसआर इंटर कॉलेज में पढ़ता है और उसको 600 में से 431 अंक प्राप्त हुए हैं। पर उसने खुद से वायदा किया है कि वो खूब मेहनत करेगा और आगे आने वाले परीक्षा में 80 फीसदी से ज्यादा अंक प्राप्त करेगा।
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अजय ने अपने जरिए एक सच्चाई को बताया कि 'उसकी इस मेहनत पर कई लोग उसके उत्साह को बढ़ाते हैं। पर कुछ लोग ऐसे भी होते थे कि जो उसका मजाक उड़ाते थे। पर उसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता था।'
 
अजय ने टीओआई से फोन पर बात करते हुए बताया कि जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तब मैंने अपने पैरों से फोन को पकड़ रखा है। अजय अपने पैरों के जरिए ही ब्रश करता है और दूध पीता है। अजय ने कुछ सोच कर कहा कि अगर मेरे हाथ होते तो मैं और ज्यादा बढ़िया कर सकता था। पर अब मेरे पैर ही मेरे हाथ बन गए हैं।

अजय के माता-पिता दयाराम और मीरा देवी ने बताया कि जब वो पैदा हुआ था तो हम चिंतित थे कि कैसे अजय एक सामान्य जीवन व्यतीत कर पाएगा। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया वो खुद को साबित करता गया। आज उसकी दिव्यांगता उसको पीछे नहीं छोड़ सकती हैं। अजय के दो और भाई हैं पर वो कक्षा आठ से ज्यादा आगे नहीं पढ़ पाए। पर अजय के ख्वाब को पूरा करने में उसकी मां ने उसका पूरा साथ दिया और आज उसने पहली सीढ़ी पार कर ली है।
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