भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक कार्यालय की ओर से भारत-नेपाल सीमा सड़क परियोजना पर संसद में प्रस्तुत लेखापरीक्षा प्रतिवेदन में यह बात उजागर हुई है। जब इन पुलों का निर्माण हुआ तो वे किसी काम नहीं आ सके। वजह, वहां पर सड़क नहीं थी। बिहार आरसीडी द्वारा सड़कों के अलाइन्मेंट में परिवर्तन कर दिया गया। इस पर कोई स्पष्टता नहीं थी कि क्या सभी पुल संशोधित अलाइन्मेंट से जुड़े हैं या नहीं। लेखापरीक्षा दल ने आरसीडी, बेतिया (पश्चिम चंपारण जिला) के अभियंताओं के साथ अभिगम्य पुलों का संयुक्त भौतिक सत्यापन किया। उन्होंने पाया कि पुल बिना किसी पहुंच सड़कों के अपूर्ण थे। ये सभी पुल मार्च 2021 अप्रयुक्त रहे, क्योंकि वे सड़कों से जुड़े नहीं थे। यह रिपोर्ट पिछले दिनों संसद सत्र के दौरान पेश की गई थी।
भारत सरकार ने नवंबर 2010 में 3853 करोड़ की लागत से बिहार (564 किमी), उत्तर प्रदेश (640 किमी) तथा उत्तराखंड (173 किमी) में भारत-नेपाल की सीमा के समानांतर 1377 किमी की सड़क का निर्माण प्रारंभ किया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसके लिए 31 मार्च 2021 तक इन राज्यों को कुल 1709.17 करोड़ रुपये की निधियां जारी की थी। परियोजना के समापन की समय-सीमा मार्च 2016 थी, परंतु बाद में इसे दिसंबर 2022 तक बढ़ा दिया गया था। निष्पादन लेखापरीक्षा योजना ने उजागर किया है कि इस योजना को बनाने में कई तरह की खामियां तथा वित्तीय प्रबंधन में अपर्याप्तताएं देखने को मिली हैं। खराब संविदा प्रबंधन तथा निर्माण कार्य के निष्पादन के साथ-साथ गतिविधियों के समकालीनीकरण तथा समन्वय की कमी से अनुचित देरी हुई। इसके चलते सरकार को अतिरिक्त धन खर्च करना पड़ा।
कैबिनेट की सुरक्षा समिति (सीसीएस) द्वारा सितंबर 2010 में पश्चिम चंपारण में एक अलाइन्मेंट को मंजूरी दी गई थी। ये अलाइन्मेंट वाल्मीकिनगर, जो वन्यजीव आरक्षित क्षेत्र के उत्तरी तरफ था, को छूते हुए आईएनबी के निकट था। यद्यपि सीमा सड़क के लिए 'एकल खिड़की प्रणाली' के अंतर्गत वन्यजीव मंजूरी उपलब्ध थी, फिर भी यह मानते हुए कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ) द्वारा वन्यजीव मंजूरी नहीं दी जाएगी, सड़क निर्माण विभाग (आरसीडी) ने इसके लिए आवेदन नहीं किया। अप्रैल 2011 में अपने हिसाब से अलाइन्मेंट में परिवर्तन किया गया। नतीजा, अलाइन्मेंट को अंतरराष्ट्रीय सीमा से 20 किमी से अधिक दूर वन्यजीव आरक्षित क्षेत्र की दक्षिणी सीमा की ओर खिसका दिया गया। इसके चलते सीमा सड़क का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। वजह, यह अलाइन्मेंट एसएसबी के गश्त क्षेत्राधिकार के परे था।
मार्च 2021 तक 363 बीओपी (81 फीसदी) प्रस्तावित सीमा सड़क के मुख्य अलाइन्मेंट से दूर थी। 363 बीओपी (बॉर्डर आउट पोस्ट) में से, 125 बीओपी एक किमी से लेकर 20 किमी के बीच की दूरी पर रही। इसके अलावा 16 बीओपी 10 किमी से अधिक की दूरी पर बनी थी। ऐसे बीओपी, जो प्रस्तावित सीमा सड़क से दूर थी, को संयोजकता प्रदान करने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया था। उत्तर प्रदेश में वन/वन्यजीव मंजूरी प्राप्त करने में विफलता तथा उत्तराखंड में जल संसाधन मंत्रालय द्वारा महाकाली नदी पर पंचेश्वर बांध के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को अंतिम रूप देने में विलंब किया गया।
इसके परिणामस्वरूप मार्च 2021 तक 1262.36 किमी की लक्षित सड़कों में से, 419.50 किमी की सड़क लंबाई (33 फीसदी) के लिए डीपीआर, जिसे अभी भी अनुमोदित किया जाना था, को छोड़ते हुए केवल 842.86 किमी (67 प्रतिशत) के डीपीआर अनुमोदित किए गए थे। गृह मंत्रालय ने यह सुनिश्चित नहीं किया था कि प्रारंभिक कार्य जैसे राज्यों द्वारा भूमि अधिग्रहण तथा वन/वन्य जीव मंजूरियों को डीपीआर के अनुमोदन से पहले पूर्ण कर लिया गया था। अनुमोदित डीपीआर में लेखापरीक्षा ने उत्तराखंड में सड़क की त्रुटिपूर्ण डिजाइनिंग तथा उत्तर प्रदेश में 11.93 करोड़ रुपये के अधिक अनुमान जैसी विभिन्न कमियां पाई।
सभी तीनों राज्यों में सड़कों के निर्माण के कार्य की प्रगति धीमी थी। सड़क निर्माण को दस वर्षों अर्थात 2011-2021 के बीत जाने के बावजूद भी पूरा नहीं किया जा सका था। भारत-नेपाल सीमा के साथ निर्माण की जाने वाली 1262.36 किमी की लक्षित सड़क में से मार्च 2021 तक केवल 367.48 किमी की सड़क (29 फीसदी) को पूर्ण (सतही कार्य) किया गया है। कार्य की प्रगति में देरी का मुख्य कारण भूमि अधिग्रहण/वन मंजूरी मिलने में देरी रहा। कार्य बाधा मुक्त भूमि को सुनिश्चित किए बिना यह काम सौंपा गया था। इससे विभिन्न चरणों पर मध्यस्थता तथा संविदाओं का समापन हुआ। यह पांच वर्षो तक अनुमोदित डीपीआर की 408.98 किमी (बिहार में 396.98 किमी और उत्तराखंड में 12 किमी) अर्थात 49 फीसदी की सड़क लंबाई पर कार्य को रोकने का कारण बना।
उत्तर प्रदेश में आठ हिस्सों के कार्य को समापन की लक्षित तिथि से 69 महीनों तक के विलंब से पूरा किया गया था। उत्तराखंड में भी 12 किमी की सड़क तैयार करने में 49 महीने से अधिक समय लगा था। उत्तर प्रदेश में, विभिन्न सड़क स्तरों पर नमूनों की अनिवार्य जांच मापदंडों के अनुसार नहीं की गई थी। मुख्य अभियंता तथा अधीक्षक अभियंताओं द्वारा फील्ड निरीक्षणों में पर्याप्त कमी थी। यह अवमानक कार्य के जोखिम से भरा था।