असम में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया के खिलाफ कांग्रेस समेत 11 विपक्षी दलों ने शनिवार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को ज्ञापन सौंपा। इन दलों ने दावा किया कि जिन मुद्दों को लेकर राज्य में पहले परिसीमन की कवायद टाल दी गई थी, उनका अब भी समाधान नहीं हुआ है।
ज्ञापन में कहा गया है कि देश में यह प्रक्रिया परिसीमन कानून-2002 के तहत वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर शुरू की गई थी, लेकिन इसका असम में इतना व्यापक पैमाने पर विरोध किया गया कि इस कवायद को टालना पड़ा। असम में परिसीमन की कवायद को टालने का विस्तृत आदेश राष्ट्रपति की ओर से आठ फरवरी, 2008 को जारी किया गया था, जिसमें कुछ कारणों का जिक्र था।
ज्ञापन में कहा गया है कि एनआरसी को अंतिम रूप दिए जाने तक इसे स्थगित करने की मांग करने वाले प्रतिनिधि, जातीय संगठनों द्वारा बड़ी संख्या में आंदोलनकारी कार्यक्रम और सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन की संभावना राज्य में परिसीमन प्रक्रिया को स्थगित करने के अन्य कारण थे। इसमें उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रपति ने 28 फरवरी, 2020 को एक आदेश पारित किया था, जिसमें पहले के आदेश को रद्द कर दिया गया था और एक परिसीमन आयोग के गठन का मार्ग प्रशस्त किया गया था, जिसे विपक्षी दलों ने गलत तरीके से गठित करने का दावा किया था।
परिसीमन आयोग को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसके कारण केंद्र ने 2021 में इससे उत्तर पूर्वी राज्यों के संदर्भ को हटा दिया था और और परिसीमन आयोग ने केवल जम्मू और कश्मीर का दौरा किया था। ज्ञापन में विपक्षी दलों ने उल्लेख किया है कि पहले की गई कवायद पर आपत्ति के कारण आज तक मान्य हैं।
ज्ञापन में कहा गया है कि यह देखते हुए कि नागरिकों के अपडेट राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है, इसलिए सरकार को परिसीमन के आदेश को अपना समर्थन देने से पहले सभी पक्षों से राय लेनी चाहिए थी।
इस बार दिये गए ज्ञापन में कांग्रेस के अलावा माकपा, रायजोर दल,असम जातीय परिषद्, जातीय दल असोम, भाकपा, राकांपा, भाकपा (माले), राजद, जद (यू) और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के हस्ताक्षर हैं। चुनाव आयोग द्वारा पिछले साल 27 दिसंबर को जारी एक अधिसूचना के अनुसार राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया एक जनवरी, 2023 को शुरू हुई थी।
इससे पहले 31 दिसंबर, 2022 को असम कैबिनेट ने चार जिलों को उन जिलों में मिलाने का फैसला किया था, जिनसे वे अलग किए गए थे। विश्वनाथ को सोनितपुर, होजई को नगांव, तमुलपुर को बक्सा और बजाली को बरपेटा में मिलाया गया था। राज्य में नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर चुनाव आयोग के प्रतिबंध लागू होने के ठीक एक दिन पहले जिलों के विलय के फैसले लिए गए थे।