थुनाग, बगस्याड़, जरोल, कुथाह, बूंगरैलचौक और पांडवशीला जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, जहां दो महीने बाद भी 266 किलोमीटर सड़कें बंद पड़ी हैं। आलू, गोभी, मटर व सेब जैसे उत्पाद खेतों में सड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन ने हिमाचल में तापमान 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ाया, जिससे मानसून की तीव्रता बढ़ी, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप ने इसे और घातक बना दिया। सराज घाटी में वन संरक्षण अधिनियम (एफसीए) 1980 की अवहेलना कर 181 लंबी 55 सड़कें बनाई गईं, जिनके लिए हजारों पेड़ काटे गए और मलबा नदियों-नालों में डंप किया गया। इससे प्राकृतिक जल स्रोत अवरुद्ध हुए, भूमिगत दबाव बढ़ा और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ गया। अधिवक्ता नरेंद्र रेड्डी ने आरोप लगाया कि अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद 53 सड़कों के प्रस्ताव मंजूरी के इंतजार में हैं। केवल दो को स्वीकृति मिली। इन सड़कों का निर्माण एफसीए नियमों के बिना हुआ, अब पुनर्निर्माण मुश्किल है।
स्थानीय इनोवेटर ओम प्रकाश ठाकुर ने बताया कि सड़क निर्माण और डंपिंग से प्राकृतिक स्रोत बंद हो गए, जिससे पानी का प्राकृतिक बहाव रुक गया और भूस्खलन हुआ। कशमल की खोदाई से बागाचनोगी उपतहसील की सात पंचायतों में भूस्खलन बढ़ा। चिऊणी की मटर वैली में खरपतवार नाशक स्प्रे से घास-झाड़ियां नष्ट हुईं, मिट्टी भुरभुरी हो गई। बगस्याड़ के दिवांशु ठाकुर ने 20-22 करोड़ के ग्रीनहाउस फूल उद्योग से गैस उत्सर्जन को जलवायु परिवर्तन का कारक बताया। सड़कों पर जल निकासी नालियों का अभाव भी भूस्खलन का कारण बना।
खड्डों और नदी किनारे बन गईं बस्तियां, पारिस्थितिकी को नजरअंदाज करना पड़ेगा महंगा
केंद्रीय विवि जम्मू-कश्मीर के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सुनील धर ने कहा कि अनियोजित सड़कें और अपर्याप्त रिटेनिंग वॉल ने पहाड़ों की स्थिरता कमजोर की। खड्डों और नदी किनारों पर असुरक्षित बस्तियां बसीं, वहां पहले घराटों की जगह थी, लेकिन इस जमीन पर सरकार ने नियंत्रण नहीं किया। हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने चेताया कि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को नजरअंदाज करने से ऐसी त्रासदियां बढ़ेंगी।