चकसराय (ऊना)। जिला ऊना की तहसील अंब से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां कामाख्या देवी मंदिर आज भी अटूट आस्था और चमत्कार का केंद्र बना हुआ है। गांव पोलियां-पुरोहितां में स्थित इस मंदिर का इतिहास करीब 500 से 600 वर्ष पुराना बताया जाता है, जो लोक मान्यताओं और भक्तों की श्रद्धा से गहराई से जुड़ा हुआ है। लोक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में इसी गांव के तीन भाई असम के गुवाहाटी स्थित मां कामाख्या देवी के दर्शन करने गए थे। वहां विधिवत पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने माता से प्रार्थना की कि इतनी दूर हर वर्ष आना संभव नहीं है, इसलिए उन्हें हिमाचल में ही दर्शन का कोई मार्ग बताया जाए। भक्तों की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर मां कामाख्या देवी ने तीनों भाइयों को स्वप्न में दर्शन दिए और आदेश दिया कि वे उनकी पवित्र पिंडियों को अपने साथ ले जाएं। माता ने कहा कि जहां भी वे इन पिंडियों को भूमि पर रखेंगे, वहीं उनका स्थायी वास हो जाएगा। तीनों भाई पिंडियां लेकर अपने गांव की ओर लौटे लेकिन रास्ते में विश्राम के दौरान उन्होंने पिंडियों को एक वटवृक्ष के बीच रखा। इसी दौरान भूमि धंसने के कारण पिंडियां वहीं स्थिर हो गईं। जब उन्होंने पुनः उठाने का प्रयास किया तो वे हिल भी न सकीं। तभी उन्हें माता के स्वप्न का स्मरण हुआ और उन्होंने समझ लिया कि यही स्थान मां का स्थायी धाम है। नवरात्रों में यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।
मंदिर कमेटी के प्रधान राकेश ठाकुर का कहना है कि मां कामाख्या देवी के इस सिद्धपीठ में सच्चे मन से की गई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती। उन्होंने बताया कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने और भोजन की व्यवस्था कमेटी द्वारा सुचारु रूप से की जाती है। उनका कहना है कि वर्षों से यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती आ रही हैं और यही कारण है कि लोगों की आस्था दिन-प्रतिदिन और अधिक मजबूत होती जा रही है।