ऊना। जहां मन की हलचल है, वहां एकाग्रता नहीं हो सकती और जहां एकाग्रता है वहां मन का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जो अपनी अंतरयात्रा की दिशा तय कर लेता है उसे भीड़ में धक्के नहीं खाने पड़ते। विरोधाभास या भ्रम में जी कर कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता। यह वचन श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन अतुल कृष्ण महाराज ने पलोह, अंब में व्यक्त किए।
कहा कि श्रीमद् भागवत कथा के कई प्रसंग तथ्यगत नहीं तत्वगत हैं। जो जीवन को यूं ही गंवा देते हैं उन्हें अंत में पश्चाताप ही करना पड़ता है. जिसे घोर संसार से पार होना है उसे भगवद् शरणागति की नौका में बैठ जाना चाहिए। जो भगवान से परम प्रेम करने लगते हैं उनके लिए मृत्यु हट जाती है। मृत्यु का कोई अर्थ ही नहीं, बचता वह है जो भागवत रस में डूब चुका है। हम अपने को देह के साथ संयुक्त समझते हैं इसीलिए मरण धर्मा मानते हैं। हम भूल ही गए हैं कि हम देह नहीं है, देह में जरूर हैं। हमें स्मरण होना चाहिए कि हम मिट्टी के दिए नहीं हैं। मिट्टी के दीये में जलती हुई चिन्मय ज्योति हैं।इस अवसर पर किशन देव शर्मा, अमित शर्मा, वतन सिंह, पंकज गौतम, सुरेंद्र सिंह सूबेदार, रमेश, आशुतोष शर्मा, सृजन शर्मा, मीनू देवी, कमला देवी, कंचन, सुमन देवी व दर्जनों श्रोता मौजूद रहे। संवाद