बोले-पुण्य नहीं कमा सकते तो अपने घर में पाप की कमाई भी न आने दें
संवाद न्यूज एजेंसी
अंब (ऊना)। हम जीवन को इस संसार में बेबसी से जीने के लिए नहीं आए हैं। हमें एक बेहतर जीवन चाहिए। सबसे आनंदमय जीवन की कुंजी हमें श्रीमद्भागवत से प्राप्त होती है। जब हम अच्छा सुनेंगे ही नहीं तो हमारे कर्म भी अच्छे कैसे बनेंगे। अच्छा सुनने से मन में अच्छे कर्म करने का संकल्प जागृत होता है। हम पुण्य नहीं कमा सकते तो अपने घर में पाप की कमाई भी न आने दें।
जिस घर में पुण्य की कमाई आती है, वहां से स्वर्ग की खुशबू निकलती है। मेहनत एवं खून-पसीने की कमाई जीवन को सारी खुशियों से भर देती है, जबकि पाप की कमाई बची खुशियों को भी उजाड़ देती है। उक्त कथासूत्र श्रीमद्भागवत कथा के समापन सत्र में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने संत भूरीवाले आश्रम, कुठेड़ा खैरला, अंब में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि अस्सी साल पहले जन्म होता है, फिर अस्सी साल के बाद मृत्यु हो जाती है। दोनों में इतना लंबा फासला है कि हम समझ बैठते हैं कि जन्म अलग और मृत्यु अलग है। दोनों का एक साथ होना हमें असंगत लगता है, जबकि जन्म एवं मृत्यु एक ही सत्य के दो पहलू हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को भगवान की बहुत सारी बातें असंगत एवं विरोधाभासी लगती हैं, तब भगवान ने अपना विराट रूप दिखाकर समाधान किया। अतुल कृष्ण जी ने कहा कि जिसने सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया उसके लिए दुख भी सुख बन जाता है । जिसने सब कुछ अपने हाथ में रखा उसके लिए सुख भी दुख बन जाता है। कथा के पश्चात विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया।