गायन और रंगकर्म के शौक ने धारावाहिकों में दिखाया हुनर
परिवार की जिम्मेवारी के साथ नौकरी में दिया समय
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। कहते हैं कि प्रतिभा किसी परिचय की मोहताज नहीं होती। उसे केवल मंच और अवसर चाहिए। मंडी शहर की साहित्यकार, लोक गायिका एवं रंगकर्मी रूपेश्वरी शर्मा ने मंडयाली शब्दकोष तैयार किया, जिसमें दैनिक बोलचाल के शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों को संकलित कर इसे एक अलग पहचान दी है। यह संग्रह अब एमाजोन पर भी उपलब्ध है। गायन और रंगकर्म के शौक के चलते उन्होंने कई धारावाहिकों में अभिनय भी किया है। प्राध्यापिका पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने साहित्य और गायन के अपने शौक को विभिन्न मंचों और सम्मेलनों के जरिए जारी रखा। रूपेश्वरी शर्मा का जन्म छोटी काशी, मंडी के पुरानी मंडी में पिता गौरीशंकर शर्मा और माता प्रेम सुंदरी के घर हुआ। बचपन से ही वे प्रतिभाशाली थीं। गायन कला उन्हें अपनी माता से विरासत में मिली। छोटी उम्र में विवाह के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। नौकरी के साथ घर और परिवार का ध्यान रखते हुए उन्होंने शिक्षा में भी समय दिया। जेबीटी के बाद उन्होंने इतिहास में स्नातकोत्तर किया। स्कूल और कॉलेज की लाइब्रेरी में रखी उपन्यास, कहानियां, आलेख और अन्य रचनाएं पढ़ते हुए उनका साहित्य में रुझान बढ़ा और उन्होंने स्वयं भी कई रचनाएं लिखीं।
1991 में उन्होंने मंचों पर आकर अपनी प्रतिभा को पहचान दिलाई। इसी समय उन्होंने मंडयाली शब्दकोष तैयार किया, जिसे न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, दिल्ली से प्रकाशित करवाया। उनके लोक गीत संग्रह में छिंज और चैती गीत, संस्कार एवं विवाह गीत, ऋतु गीत, भ्यागड़े, भ्याई और बारा मासा गीत शामिल हैं। उन्होंने कई काव्य-संग्रह लिखे, जिनमें कोख से कब्र तक, धूंध, अनुत्तरित प्रश्न तथा बच्चों के लिए मंडयाली और हिंदी में नानी-दादी की कहानियां शामिल हैं।
रूपेश्वरी शर्मा का कहना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। अपने शौक को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। साथ ही लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए हमें सतत प्रयास करना चाहिए, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी का रुझान पाश्चात्य संस्कृति की ओर अधिक है, जिससे हमारी लोक संस्कृति लुप्त होने का खतरा है।