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Una News: सूखे पड़े तालाब, जल संरक्षण पर लाखाें खर्चे पर नहीं सुधरी व्यवस्था

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तालाबों को बचाने के लिए डंगे लगाने की योजना के बाद भी पानी का नहीं हुआ संरक्षण
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संवाद न्यूज एजेंसी
मुबारिकपुर (ऊना)। पुराने समय से ही प्रकृति संतुलन को बनाए रखने को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-बड़े तालाबों का निर्माण किया गया है। इसके बाद सरकारों की तरफ से समय-समय पर जल संरक्षण के लिए तालाबों का निर्माण और चारों तरफ डंगे लगाने के लिए लाखों खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद इन तालाबों में पानी की एक बूंद भी नहीं है।
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तालाबों की संख्या तो काफी है लेकिन वर्तमान में अधिकतर की दशा संतोषजनक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब लुप्त होने के कगार पर है। दूसरी तरफ कई स्थानों पर मंदिरों और देवस्थलों का आकार बढ़ाने की आड़ में तालाबों पर निर्माण किया जा चुका है। इससे तालाबों का आकार कम हुआ है। सूखे पड़े तालाबों में भांग, बूटी के साथ-साथ गांव के लोगों की ओर से कूड़ा फेंका जा रहा है। गगरेट क्षेत्र के ही कुछ गांवों की धरातल की तस्वीर पर नजर दौड़ाएं तो इन तालाबों के सुधार को लेकर ग्राम पंचायतों की ओर से किनारों पर डंगों को लगाने के लिए लाखों की राशि तो खर्च की लेकिन इन तालाबों में एक बूंद भी पानी नहीं है। कैच द रेन योजना भी वर्षा जल सरंक्षण को लेकर शुरू की गई थी लेकिन वास्तविकता में तालाब सूखे पड़े हैं। जागरूक पर्यावरण प्रेमियों में दीपक, सुखविंदर, आरके.आशीष, विजय, राकेश की मानें तो गांवों के तालाबों में वर्षा जल संग्रहण किया जाए तो आसपास के वर्षों से सूखे जल स्रोत पुन : रिचार्ज होकर जीवंत हो सकते हैं। यह तभी संभव हो पाएगा जब हर ग्रामीण इन कार्यक्रमों और वर्षा जल की अहमियत को समझने का प्रयास करे। क्षेत्र की सामाजिक जागरूकता, पौधे व जल बचाव और पर्यावरण से जुड़ी दिव्यांशी शिक्षा समिति व देवभूमि युवा सामाजिक सभा बनेहड़ा अप्पर, ब्लड सागर वेलफेयर सोसायटी नंगल जरियाला के सदस्यों ने बताया कि सूखे पोखर तालाबों में वर्षा के पानी को पहुंचाने के लिए सभी पंचायतों के लोगों को बारिश से पहले कमर कस लेनी चाहिए। समिति ने आह्वान किया कि स्वयंसेवी बनकर इन तालाबों को पानी से जीवंत बनाकर प्रकृति का सहयोग किया जा सकता है।
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