दुलैहड़ (ऊना)। हरोली में दुकान का बिजली कनेक्शन काटे जाने और जबरन बेदखल किए जाने की आशंका को लेकर वर्ष 2012 में दायर मुकदमे को अदालत ने खारिज कर दिया। सिविल जज कोर्ट -3 ऊना की अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वादी बिजली कनेक्शन काटे जाने या उसे दुकान से जबरन हटाए जाने का वास्तविक खतरा साबित नहीं कर सका। अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान बिजली कनेक्शन चालू रहा और बिजली बोर्ड ने उसे कभी काटा ही नहीं।
वादी ने 29 अक्तूबर 2012 को स्थायी निषेधाज्ञा के लिए मुकदमा दायर किया था। उसके अनुसार वह हरोली में दुकान किराये पर लेकर सिलाई का काम करता था। दुकान में लगा बिजली मीटर मकान मालिक के नाम था और वह नियमित रूप से बिजली बिल जमा कर रहा था। उसका कहना था कि अक्तूबर 2012 में एक व्यक्ति ने बिजली बोर्ड के एसडीओ के समक्ष मीटर काटने के लिए आवेदन दिया। वादी ने इसे दुकान खाली करवाने के लिए दबाव बनाने का प्रयास बताया और बिजली बोर्ड को कनेक्शन काटने से रोकने तथा अन्य प्रतिवादियों को उसे दुकान से बेदखल करने से रोकने की मांग की। मामले की सुनवाई के दौरान बिजली बोर्ड के कर्मचारी ने संबंधित रिकॉर्ड पेश किया। उसने बताया कि दुकान में लगे मीटर मकान मालिक के नाम पर पंजीकृत थे। जिरह में उसने माना कि कानूनी वारिसों की ओर से मीटर हटाने या कनेक्शन काटने का कोई आवेदन नहीं दिया गया था। अदालत ने पाया कि एक व्यक्ति की ओर से कनेक्शन काटने के लिए आवेदन दिया गया था लेकिन बिजली बोर्ड ने उस पर कार्रवाई नहीं की।
वादी ने गवाही के दौरान स्वीकार किया कि दुकान में लगाया गया बिजली मीटर अभी भी वहीं मौजूद है। बिजली बोर्ड की ओर से उसे कनेक्शन काटने संबंधी कोई नोटिस नहीं मिला और मीटर भी कभी नहीं हटाया गया। अदालत ने कहा कि जब कनेक्शन लगातार चालू रहा, बिजली बोर्ड की ओर से कोई नोटिस नहीं दिया गया और मीटर भी नहीं हटाया गया तो कनेक्शन काटे जाने की आशंका को वास्तविक और विश्वसनीय खतरा नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका या आरोप के आधार पर स्थायी निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती। वादी को यह साबित करना जरूरी था कि उसके कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है या उसके उल्लंघन का वास्तविक खतरा मौजूद है। सिविल जज ने फैसला सुनाते हुए वादी का मुकदमा खारिज करते हुए दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने के निर्देश दिए।