बुजुर्ग बोले, 1988 से भी खतरनाक साबित हो रही इस बार की बरसात
मानसून में मकान, फसलें और रास्ते हो चुके हैं तबाह
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ूही (ऊना)। इस बार की बरसात ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया है। भारी बारिश के चलते जहां बेसमेंट पूरी तरह तबाह हो चुके हैं, वहीं लगातार हो रही बरसात ने मकानों की दीवारों और लेंटर को भी सीलन ने खोखला कर दिया है। कई घरों के लेंटर टपकने लगे हैं, जिससे लोग अपनी ही छत के नीचे रहने से डर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में बच्चे, बुज़ुर्ग और मवेशी तक इस आपदा से परेशान हैं। फसलें चौपट हो गई हैं, रास्ते टूट गए हैं और मकान मलबे में तबदील हो रहे हैं। लोग सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से राहत और मदद की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि सबसे पहले नदी-नालों से अवैध कब्ज़े हटाए जाएं और जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त की जाए, वरना भविष्य में ऐसी बरसात और बड़े संकट का कारण बनेंगी। उनका मानना है कि केवल राहत बांटने से हालात नहीं सुधरेंगे, बल्कि स्थायी समाधान आवश्यक है। स्थानीय लोग कह रहे हैं कि यह बरसात 1988 की भीषण बरसात से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है।
105 साल की उम्र में मैंने बरसात के कई मौसम देखे, लेकिन इस बार की बरसात ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। जिस बेसमेंट में राशन और लकड़ी रखते थे, सब पानी में डूब गया। दीवारों में दरारें आ गई हैं। 1988 की बरसात भी भयंकर थी, लेकिन तब पानी की निकासी ठीक थी। आज पानी के रास्ते बंद हो गए हैं और घरों में घुस रहा है। ऐसी बरसात मैंने अपने जीवनकाल में कभी नहीं देखी। -105 वर्षीय लाजवंती देवी, गांव बासूणी, बेहड जसवां
लोगों के मकानों की नींव तक पानी समा गया है। लेंटर टपक रहे हैं और लोग बच्चों को लेकर सुरक्षित जगह भाग रहे हैं। पक्के मकान तक टूट रहे हैं। जानवरों को बांधने की जगह नहीं बची। घर में रहना खतरे से खाली नहीं। यह बरसात 1988 से भी खतरनाक है। -85 वर्षीय विमला देवी, गांव चक्क पंचायत बेहड़ जसवां
खेतों में खड़ी धान और मक्की की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। लोगों के घरों में लेंटर से पानी टपक रहा है, सीलन से खाना पकाना भी मुश्किल हो गया है। 1988 में भी दिक्कतें थीं, लेकिन तब पानी मकानों में नहीं घुसता था। अब बड़े-बड़े झाड़-झंखाड़ और कब्जों ने निकासी मार्ग बंद कर दिए हैं, यही इस तबाही की जड़ है। यह बरसात हमारे जीवन की सबसे खतरनाक बरसात है। -किसान अजय चौधरी, टकारला
पहले लोग बरसात को भगवान की कृपा मानते थे, लेकिन अब यह कहर बन चुकी है। 1988 का मंजर भी मेरी आंखों में ताज़ा है, मगर उस समय नाले-खड्ड खुले थे। अब लोगों ने कब्ज़ा कर पानी के रास्ते रोक दिए हैं, जिससे पानी सीधे गांवों में घुसकर तबाही मचा रहा है। मैंने अपने जीवन में इतना डरावना मंजर कभी नहीं देखा। यह सब प्रकृति के साथ खिलवाड़ का नतीजा है। -80 वर्षीय शिव नारायण, गांव चक्क