ऊना। जिले में इस बार मौसम की बेरुखी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। समय पर बारिश नहीं होने और लगातार बढ़ते तापमान के कारण जिले के करीब 60 फीसदी क्षेत्र में गेहूं की फसल प्रभावित हो गई है। खेतों में खड़ी फसल तेज धूप और गर्मी के कारण झुलसने लगी है, जिससे किसानों को उत्पादन घटने का डर सताने लगा है।
किसानों से मिली जानकारी के अनुसार इस समय गेहूं की फसल दाना बनने की अवस्था में है, जो फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। बारिश की कमी और मिट्टी में नमी घटने के कारण फसल को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा। इससे कई स्थानों पर गेहूं की बालियां कमजोर पड़ रही हैं और दाने ठीक तरह से नहीं भर पा रहे।
ध्यान रहे कि जिले में इन दिनों अधिकतम तापमान करीब 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। सामान्य तौर पर इस समय मौसम में इतनी अधिक गर्मी नहीं होती, लेकिन इस बार समय से पहले ही तापमान में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है। तेज धूप के कारण खेतों की नमी तेजी से खत्म हो रही है और फसलें झुलसने लगी हैं। किसान बताते हैं कि यदि जल्द ही मौसम में बदलाव नहीं हुआ और हल्की बारिश नहीं हुई तो गेहूं की उपज पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
जहां गेहूं की फसल मौसम की मार झेल रही है, वहीं आलू की खेती भी मुश्किल दौर से गुजर रही है। किसान आलू की फसल को बचाने के लिए लगातार सिंचाई का सहारा ले रहे हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ती जा रही है और आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां किसानों के सामने फसल को बचा पाना और भी बड़ी चुनौती बन गया है।
बता दें कि जिला के बंगाणा, अंब, चिंतपूर्णी, गगरेट, ऊना और हरोली के कई इलाकों में अभी सिंचाई सुविधा शत-प्रतिशत नहीं हो पाई है। इससे किसानों को बारिश पर निर्भर रहकर खेती करने को मजबूर होना पड़ता है। किसानों में रविपाल, अश्वनी कमार, सुरेंद्र सैनी, गुरविंद्र सिंह, साहिल सैनी का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मौसम के मिजाज में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी समय से पहले गर्मी पड़ जाती है तो कभी बारिश अनियमित हो जाती है। ऐसे हालात में खेती करना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। किसानों का कहना है कि यदि इसी तरह मौसम का संतुलन बिगड़ता रहा तो भविष्य में कृषि करना और भी मुश्किल हो जाएगा।
किसान समय-समय पर खेतों की सिंचाई करें। साथ ही आवश्यकतानुसार उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करने और फसल की नियमित निगरानी भी करें ताकि नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सके।
-प्रेम चंद ठाकुर, जिला कृषि उपनिदेशक