ऊना। आधुनिक तकनीक बायोफ्लॉक से कम पानी और कम खर्च में अधिक मछली उत्पादन संभव है। बायोफ्लॉक तकनीक मछली पालन का आधुनिकतम वैज्ञानिक तरीका है। बायोफ्लॉक तकनीक के तहत मछली पालन को पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत लाया गया है ताकि किसान कम जगह और पानी में आधुनिक तकनीक की मदद से कम खर्च में अधिक कमाई कर सकें।
तालाब बनाकर भी सघन मछली पालन संभव नहीं है, जबकि बायोफ्लॉक तकनीक में पानी का इस्तेमाल भी कम होता है और मछली के चारे की बचत भी काफी होती है। क्योंकि तकनीक के माध्यम से मछलियों के अपशिष्ट को पानी के अंदर ही फिर से प्रोटीन के रूप में बदल दिया जाता है। यानी कम खर्च में अधिक मुनाफा। पीएम मत्स्य संपदा योजना के तहत बायोफ्लॉक तकनीक के अलावा रिसर्कुलर एक्वॉकल्चर सिस्टम (आरएएस) को भी कवर किया गया है। इस सिस्टम को अपनाकर कम क्षेत्र में मछली उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
40 से 60 प्रतिशत तक सब्सिडी
बायोफ्लॉक तथा आरएएस के तहत किसानों को छोटे टैंकों का निर्माण करना होता है तथा टैंकों की क्षमता के मुताबिक इसे तीन श्रेणियों में बांटा गया है, जिनकी लागत 7.5 लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक हो सकती है। सरकार इस पर 40 से 60 प्रतिशत तक सब्सिडी प्रदान करती है। तकनीक आधारित मछली पालन अपनाकर एक बार में 4 से लेकर 40 टन तक मछली उत्पादन किया जा सकता है।
मत्स्य क्षेत्र में होगा सबसे अधिक निवेश
मत्स्य पालन मंत्री वीरेंद्र कंवर ने बताया कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाना प्रस्तावित है। योजना के अंतर्गत मत्स्य क्षेत्र में होने वाला 20,050 करोड़ रुपये का निवेश सर्वाधिक निवेश है। इस योजना का लक्ष्य वर्ष 2024-25 तक मत्स्य उत्पादन में अतिरिक्त 70 लाख टन की वृद्धि करना है ताकि मछुआरों और मत्स्य पालकों की आय को दोगुना किया जा सके। उन्होंने उम्मीद जताई कि मत्स्य पालन के क्षेत्र और सहायक गतिविधियों से हिमाचल प्रदेश में हजारों व्यक्तियों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।