पारंपरिक तरीके से खेती करते हुए किसान। संवाद
जोल (ऊना)। आज के मशीनी युग में जहां लोग परंपरागत तरीकों को भूलते जा रहे हैं, वहीं उपतहसील जोल के अंतर्गत आते कई गांवों में आज भी लोग परंपरागत तरीके से मक्की की बिजाई कर रहे हैं। बैलों से की गई बिजाई में भले ही समय अधिक लगता है लेकिन कुछ लोग आज भी इसे अधिक लाभकारी मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब मशीनी युग का समय आ गया है लेकिन ट्रैक्टर और बैलों की बिजाई में दिन-रात का अंतर है। उनका मानना है कि बैलों से की गई बिजाई से फसल की पैदावार में अच्छी वृद्धि होती है और खेत भी समतल रहते हैं। मशीनी युग में पारंपरिक रूप बैलों से खेती करने का यह प्रयास किसानों का परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है।
ट्रैक्टर और बैलों की बिजाई में काफी अंतर रहता है। ट्रैक्टर से बिजाई करने में बीज की अधिक खपत होती है और खेत भी समतल नहीं रहते हैं। बैलों से बिजाई करने से बीज सही ढंग से ज़मीन में चला जाता है और पैदावार भी अच्छी होती है। इस खेती में तूफान से फसल कोई नुकसान नहीं होता है।
अमरेश चौधरी, किसान बेहलां
मशीनी युग भले ही आ गया है जिसमें समय की बचत तो जरूर होती है लेकिन बैलों से जमीन को अच्छे तरीके से जोता जा सकता है। बीज भी अच्छे से जमीन की गहराई में जाते हैं। ट्रैक्टर की बिजाई में कई बार फसल का बीज ऊपर ही रह जाता है या जमीन से काफी नीचे चला जाता है, इससे दोनों तरफ किसानों को नुकसान ही होता है।
-कश्मीर सिंह, किसान बेहलां