अधिकतर किसानों ने गेहूं की फसल को माना बेहतर
घाटे ने छीना भरोसा, आलू की खेती से दूर हुए किसान
आलू की फसल पर किसानों को व्यापारी देते हैं मनमर्जी के दाम
गेहूं के लिए सरकार की ओर से निर्धारित दाम होते हैं प्राप्त
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। जिले में आलू की खेती के प्रति किसानों का रुझान लगातार घटता जा रहा है। चालू रबी सीजन में आलू की पक्की फसल का रकबा पिछले वर्ष के लगभग 1200 हेक्टेयर से घटकर इस बार करीब 1000 हेक्टेयर रह गया है। लगभग 200 हेक्टेयर की यह कमी किसानों के बदलते रुझान को साफ तौर पर दर्शाती है। किसानों का कहना है कि आलू की खेती में लागत काफी अधिक होती है। इसके बावजूद उन्हें उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। आलू की फसल का बाजार पूरी तरह व्यापारियों पर निर्भर रहता है, जो खरीद के समय मनमाने दाम तय करते हैं। कई बार मेहनत और खर्च के बाद भी किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। इसके विपरीत किसान गेहूं की खेती को अधिक सुरक्षित और लाभकारी विकल्प मान रहे हैं। गेहूं की फसल पर सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित किया जाता है, जिससे किसानों को फसल का निश्चित मूल्य मिलने की गारंटी रहती है। सरकारी खरीद व्यवस्था के कारण किसानों को उपज बेचने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती।
किसानों अश्वनी कुमार, सुरेंद्र सैनी, अरविंद कुमार, मनवीर सिंह, सुरिंद्र पाल और राजेश कुमार ने बताया कि आलू की फसल में भंडारण, परिवहन और समय पर बिक्री सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, जबकि गेहूं की फसल मंडियों में आसानी से खरीदी जाती है। किसानों का कहना है कि आलू खरीद के समय व्यापारी मनमर्जी के दाम तय करते हैं, जिससे कभी अच्छे तो कभी बेहद कम दाम मिलते हैं। उन्होंने कहा कि आलू की खेती जुआ खेलने के समान हो गई है, जिसमें कब घाटा हो जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। किसानों ने मांग की कि यदि आलू की खेती को बढ़ावा देना है तो इसके लिए मूल्य समर्थन, पर्याप्त भंडारण सुविधाएं और बेहतर विपणन व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। इस संबंध में उपनिदेशक जिला कृषि विभाग डॉ. कुलभूषण धीमान ने बताया कि आलू उत्पादन और विपणन से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है। सरकार और विभाग इस दिशा में गंभीरता से प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आलू किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होगा।